Tuesday, December 22, 2009
माँ, प्यारी माँ...!३
हाँ, वही क़िस्सा बयाँ करनेके खातिर आज लिखना शुरू किया....
पता नही क्यों,रायभान को बस्ती परके सारे बच्चे, हिक़ारत से देखते थे...उसके साथ बुरी तरहसे पेश आते थे...जैसे कि,वो बतख की कहानी...उन बतखों मे एक हँस था..जिसे सब कुरूप कहते थे....रायभान की माँ, हमारे घरमे काम करती थी....
"सब बच्चे हमारी घरकी सीढियों पे बैठ, कुछ खेल रहे थे...मै बगीचे से आयी और सीढीयाँ लाघते हुए, रायभानको एक लात मार दी...बेचारेने," अरे, हटता हूँ, हटता हूँ," कहा और हट गया...
अम्मा, आप सब देख रहीँ थीं...आपने अन्य बच्चों को एक तरफ़ बिठा दिया ...मुझे और रायभानको अपने सामने बुलाया...
"मुझसे बोलीं," इसके सामने कान पकडके १० बार उठक बैठक करो, और हर बार माफी माँगो...कहो,कि, ऐसी हरकत फिरसे कभी नही करोगी..!"
"बेचारा रायभान बडाही सकुचाया-सा एक कोनेमे खड़ा हो गया...
"आपके आगे मना करनेका तो सवालही नही था..जैसा आपने कहा वैसाही मैंने किया......
उसके बाद आपने सब बच्चों को अपने,अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास,प्यारसे लेके बैठीं और कहा," देखो बेटा, खुदाके आगे सब बच्चे एक जैसे होते हैं...और तुम्हें उसे लात मारके ख़ुशी मिली? तुमने हरकोई उसके साथ ऐसीही चाल चलता है ये देखा और वैसाही किया...हैना? '
"अम्मा, ये शत प्रतिशत सच था...मै खामोश बैठी रही...मेरी उम्र थी कुछ ३ सालकी...लेकिन मैंने ग़लत बात की है, ये मै खूब समझ गयी...
"उस रात मेरे गलेसे खाना उतरा नही..दादा पूछते रहे,कि, मै क्यों खाना नही खा रही...
आपने कहा," कोई बात नही गर एक रात नही खायेगी तो...उसने शामको दूध तो लेही लिया है...फलभी खाया है...नही खा पा रही,तो उसे सो जाने देते हैं।'
"दूसरे दिन सुबह हुई,तो मैंने अपनी माँ और पिताको घरसे नदारत पाया....दादी को पुकारने लगी...वो आ गयीं....
मैंने उनसे पूछा," अम्मा और बाबा कहाँ गए हैं? और वनुमासी,(रायभान की माँ,) क्यों नही आयी? आप क्यों नाश्ता बना रहीं हैं?"
दादीअम्मा ने कहा," तुम्हारे अम्मा -बाबा किसी वजहसे अस्पताल गए हैं...!"
बाबा तो कुछ देर बाद लौट आए...आप नही लौटी....
शाम हुई तो मैंने ज़िद की," दादी अम्मा मुझे बस्ती परके बच्चों के साथ खेलना है...उन्हें बुलाओ ना...और रायभान से मुझे,'डम डम डिगा,डिगा ये गाना भी सुनना है..."
दादी अम्माने मुझे समझाते हुए कहा, " आज नही...अभी कल देखेंगे....! चलो आज मैही तुम्हें कहानी भी सुना दूँगी, और खाना भी खिला दूँगी.."
"अम्मा आप देर रात किसी वक़्त आयीं ...मुझे ठीकसे पता नही चला, लेकिन आपको मेरी बग़ल मे पाके बड़ा सुरक्षित लगा..
"सुबह मेरी आँखें खुली, तो फिर आप मेरे पास नही थीं ...मुझे बस्ती परसे रोने धोनेकी आवाजें आ रहीं थीं...मै कुछ समझ नही सकी...जानती थी,कि, बस्तीपरके कई मर्द अपनी बीबिओं को मारते हैं..ऐसेमे वो रोती,रोती माँ या दादी के पास आती थीं..अब जब माँ ख़ुद बस्तीपे मौजूद है,ये मुझे बताया गया, तो मुझे बेहद हैरानी हुई,...माँ के होते हुए भी क्या उन औरतोंको मारा जा रहा है?
मैंने दादी अम्मासे कहा," मुझे बस्तीपे जाना है...मुझे जाने दो ना.....!"
"दादीअम्मा ने मुझे अपनी गोदीमे लेके कहा," अभी नही...शामको देखेंगे......"
"लेकिन आप कलसे मुझे रोक रहीं हैं..मुझे वो गाना सुनना है रायभान से...उसे तो बुला लो ना..!"मैंने अपनी ज़िद कायम रखी......
"अंतमे दादी अम्मा ने शायद सोचा कि, मुझे चंद बातें औरोसे पता चलें, उस बनिस्बत, वो खुद्ही बता दें तो बेहतर होगा......
"वो कहने लगीं,तो मैंने गौरसे उनके चेहरेकी ओर देखा...उनकी आँखों मे पानी था..होंठ काँप रहे थे,....... उन्हों ने कहना शुरू किया," बच्चे, रायभान अब फिरसे यहाँ कभी नही आयेगा.......!"
"लेकिन क्यों? मैंने उसे लात मारी थी इसलिए? मैंने माफी तो माँगी थी..दादी अम्मा आप उससे कहो ना,कि, मै फिरसे ऐसा नही करूँगी.." मुझे अब रुलाई-सी आने लगी थी...
"दादी अम्माके आँखों से अब पानी बहने लगा था...वो बोलीं," रायभान अब भगवान् जी के पास चला गया है! वो दोबारा हमें कभी नही दिखेगा....!"
मेरा मन एकदमसे धक्-सा रह गया..मै इतना जानती थी,कि, एकबार जब कोई "भगवान्" या "खुदाके" पास जाता है तो फिर कभी नही लौटता...! मुझे यक़ीन हो गया कि,वो मुझीसे रूठके चला गया....मेरे बाल मनपे जो उस समय गुज़री, उसका बयान करना कठिन है.....
"बादमे पता चलता रहा...वनुबाई ने चुल्हेपे बड़े-से पतीलेमे, नहानेके लिए पानी गरम करने चढाया था...रायभान और उसकी छोटी बेहेन छबी, वहीँ पे शायद कुछ उधम मचा रहे थे...वो खौलता पानी, चुल्हेपरसे उलट गया और दोनों बच्चों पे जा गिरा...छबू तो बच गयी...रायभान ईश्वर को प्यारा हो गया....
"मुझे याद है, मै, बोहोद दिनों तक सदमेमे चली गयी थी..खानेके लिए जैसे मुझे बिठाया जाता था, मुझे उबकाई आ जाती थी..मुझे अन्य एक बच्चे ने बताया था,कि, रायभान को भूक लगी थी, इसलिए वो अपनी माँ के पास पोहोंचा था..रोटी माँगते हुए...मुझे अब तो याद नही,कि, मै कितने दिन खाना नही खा पायी....
"अम्मा, अगर आप उस शाम मुझसे माफी ना मँगवाती,तो ताउम्र मै पश्च्यातापकी अग्नीमे जलती रहती...कभी खुदको माफ़ करही नही पाती...आजभी वो सारी बातें मेरे मनमे ऐसे अंकित हैं, जैसे कल परसों घटी हों....
सोचती हूँ, मैंने ऐसी हरकत कीही कैसे? क्या सवार था मुझपे? सिर्फ़ किसी अन्य की देखा देखी कर दी? लेकिन,जब कभी मुझे ये बात याद आती है तो शर्मसार हो जाती हूँ...जब कभी, डम डम डिगा, डिगा ये गीत बजता है,तो रायभान का भोला-सा चेरा सामने आ जाता है..."
क्रमश:
Friday, August 14, 2009
ये कहाँ आ गए हम...?७ अन्तिम
सबसे पहले तो मैंने वंदन और निम्मीकेही नंबर घुमाए...क्या कमाल था कि दोनों " पोहोंचके बाहर" थे...!! ऐसाभी क्या इत्तेफाक़??उठाके कहाँ दे मारूँ इन उपकरणों को ...? ये नज़दीकियों के साधन, जब दूरियाँ पैदा कर दें, तो इनका क्या फायदा? किसे कहूँ, कि रुको...अभी इन साधनों द्वारा दी जा रही जानकारीपे विश्वास ना करो? जिनसे कहना चाह रही थी...जिनसे सत्य जानना चाह रही थी...उन्हीँ से संपर्क नही हो रहा था...
मैंने निम्मीके सास -ससुरसे पहले संपर्क करना चाहिए??क्या उनके कानों तक तो ये ख़बर नही पोहोंच गयी? गर पोहोंच गयी हो तो मै क्या कहूँगी...? मेरे पास कहनेको क्या रहेगा....?
जब मुझेही उस खबरकी यथार्थता मालूम नही, तो मै क्या कह सकती हूँ? ये, कि आप अभी उस खबरपे विश्वास न रखें...?
और गर नही मिली वो ख़बर तो मेरी परेशानी, मेरी अधीरता वो भाँप नही जाएँगे? और गर निम्मी या वंदन, दोनोसे उनका संपर्क नही, तो क्या मुझसे नही पूछ बैठेंगे...कि मैं कुछ जानती हूँ, उन दोनोंके बारेमे ?
सहजही पूछा जानेवाला प्रश्न होगा वो...तब मै क्या कहूँगी? के कुछ नही जानती? जब बादमे पता चलेगा कि, मै जानती थी...तो फिर क्या जवाब दूँगी? सिर्फ़ ये कि, उस खबरकी सच्चाई नही जानती थी?
मैंने मेरे पतीसे सबसे पहले संपर्क करना चाहिए...कैसी अजीब बात है...मै जब, जब बेहद शशोपंज मे रही हूँ, हर वक्त अकेली रही हूँ...इसमे कभी कोई मेरे साथ नही होता...क्या ये मेहेज़ एक इत्तेफाक होता है या ईश्वर हरबार मेरी परिक्षा लेना चाहता है?
मैंने इन्हें फोन लगाना शुरू कर दिया...." आप जिस व्यक्तीसे संपर्क करना चाह रहे हैं, वो इस वक्त पहुँचके बाहर है.."...उफ़ ! बार, बार यही एक वाक्य मेरे कानोंसे टकराता रहा...निम्मी और वंदन से तो संपर्क पहलेही नही था...
क्या ख़बर थी वो? ख़बर थी...किसी वंदन के सहयोगी द्वारा किया गया वो फोन था...." वंदन की प्रथम पत्नी गर्भवती है...वंदन केही बच्चे की माँ बनने वाली है...!!"
ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसी बात वंदन करही नही सकता...लेकिन वो फोन क्यों नही उठा रहा है? वो तो अगली सुबह निम्मीके पास पोहोंचने वाला था....तो निम्मीसे संपर्क क्यों नही कर रहा??
और निम्मी ....? वो मेराभी फोन क्यों नही उठा रही ?? मेरा फोन बजबजके बंद हो रहा था...कितनी बार कोशिश कर चुकी थी....क्या उसे मेरे पहले ये भयंकर ख़बर मिल गयी?
और येभी कि, वंदन अब उसके पास नही लौट सकता? उसने येभी मान लिया कि, निम्मी या निम्मीके परिवारवाले उसे माफ़ नही करेंगे? के गर उसे अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी निभानी होगी तो उसे, उसकी प्रथम पत्नीके पासही लौटना होगा...? तो क्या निम्मीके प्रती उसकी कोई ज़िम्मेदारी नही? उसकी प्रथम पत्नी कैसे उसपे ये ज़िम्मेदारी डाल सकती है, जब वो कोई छोटी बच्ची नही...? अपने पतीसे कानूनन बिभक्त हो चुकी है...निम्मी वंदन की क़ानूनन ब्याहता है....
जोभी हो, वंदन की ज़िम्मेदारी है, कि, आमने सामने बात साफ़ करे....जिस विश्वासके साथ निम्मीने उसे उसकी भूतपूर्व पत्नीके पास भेजा था....उतनीही ज़िम्मेदारी से , उसने अपना बर्ताव रखना चाहिए था...
सुबह हो गयी....लेकिन मै किसीसेभी संपर्क नही कर पायी....लग रहा था, जैसे मै किसीभी वक़्त अपने होश खो बैठ सकती हूँ....और एक दिन बाद मेरे बच्चे, जो दोनों शेहेरके बाहर थे, लौट आएँगे...मै उनसे अपनी हालत तो नही छुपा सकती...वंदन की कितनी इज्ज़त करते हैं दोनों...उन्हें क्या कहूँगी??
एकेक पल, मानो एक सदीकी तरह गुज़र रहा था....पर वक़्त थम नही रहा था...उसी रफ़्तार से गुज़र रहा था....मुझे चाहे एक पल,एक युग लगे....शांत, स्तब्ध मौहौलमे, मेरे कमरेकी घडीकी टिकटिक सुनायी दे रही थी....मेरे हाथसे फिसल रहे लमहोंका कितना अधिक एहसास करा रही थी....
मेरे घरमे कितनी विलक्षण ख़ामोशी थी....कान कितने अधीर थे कि, कहीँ कोई इंसानी वजूदका एहसास हो...कुछ तो आवाज़ हो...एक बार तो फोन बजे...चाहे कहीँ से हो....अपने मोबाइल से मै चिपकी हुई थी....चाय बनाऊँ ? कॉफी बनाऊँ? पियूँ ? बेहतर लगेगा? नही...बनानेकी ताक़त नही है...कामवाली औरत को छुट्टी दे रखी थी....
पडोसमे जाऊँ? क्या कहूँ वहाँ जाके? जिनके आगे मैंने वंदन को एक फ़रिश्ता बनाके पेश किया था....उन्हें ये कहूँ कि वो फ़रिश्ता क्या...एक घटिया से घटिया आदमीकी तौरपे सामने आ रहा है....बेज़िम्मेदार, डरपोक...
लेकिन मुझे अभी सच पता था? सचमे ऐसा हुआ था? बेहतर होगा, मै ख़ामोश रहूँ....लेकिन ये इंतज़ार मेरी जान ले रहा था...असह्य लग रहा था........टिक टिक....खामोशी को भेदनेवाली यही एक आवाज़.....
मै लेट गयी...पैर...पैर क्या, अब तो पूरा जिस्म काँप रहा था...
और फ़ोन बजा...मै ऐसे झपटी, जैसे चीता किसी शिकारकी तरफ़ झपटता हो....फोन मेरे पतीका था...
" क्या कर रही हो? तुम्हारी आवाजमे इतनी परेशानी क्यों है?",इनकी आवाज़...
" परेशान हूँ...बेहद...आपसे कितनी बार संपर्क करनेकी कोशिश कर चुकी...क्या आपको मेरे sms भी नही मिले?" मै बरस पड़ी ...
" नही तो..मुझे तो हैरानी हो रही थी कि, मै फोन करता जा रहा था, और मुझे मेसेज मिल रहा था," पोहोंचके बाहर...", इनका उत्तर...
"कमाल है...मुझे आपकी ओरसे यही मेसेज मिल रहा था...खैर !आप अभी के अभी, पहले वंदन और फिर निम्मीसे संपर्क करनेकी कोशिश कीजिये....उनसे..."
मै इन्हें निर्देश देने लगी....
"लेकिन बात क्या है? मुझे पहले ये तो बताओ...क्या परेशानी है? ऐसी क्या जल्दबाज़ी है...? हो क्या गया है तुम्हें?", इन्होंने टोक दिया....
मैंने संक्षेपमे इन्हें सारी बात बता दी....ये कुछ समय स्तब्ध हो गए....फिर बोले,
"मेरी निम्मीसे बात हुई.....निम्मीको ये ख़बर दी गयी है....वो पूरी तरह टूट गयी है....मै जानना चाह रहा था तुमसे...कि तुम्हें कुछ आगेकी बात पता है....निम्मीने मुझसे कहा,' मै तो वंदन को माफ़ कर दूँ...पर मुझसे बात तो करे....मै समझ सकती हूँ...इंसान है...उसने उस औरतसे कभी प्यार किया था...लेकिन मुझसे बात तो करे....'..."
इन्हों ने मुझे ख़बर दी।
"तो निम्मीने आपसे बात की..मुझसे नही...? कमाल है...? उसने एक पलभी नही सोचा कि, जब मुझे ख़बर मिली होगी तो मुझपे क्या गुजरेगी..?"अब मुझे निम्मीपे गुस्सा आने लगा....
" देखो, जो मेरे साथ हुआ...वही उसके साथ...उसेभी तुम्हारा नंबर नही मिल रहा था...और ना मुझे पता था, ना उसे, कि तुम्हें किसीने ख़बर दी होगी...", मेरे पतीने मुझसे बताया...
"तो अब हमें क्या करना चाहिए? कैसे पता चलेगा कि, सच्चाई क्या है? कौन बतायेगा? आप वंदन का फ़ोन तो मिलाएँ...", मै बताने लगी....
"तुम्हें क्या लगता है..मैंने वंदन को फ़ोन नही लगाया होगा...? "इन्होंने पूछा....
"चलिए ठीक है...जब मुझे येही नही पता था कि, आपसे निम्मीका संपर्क हुआ, तो मै और क्या कह सकती थी...?"मैंने जवाब दिया....
निम्मीकी प्रतिक्रया सुन, मुझे कुछ तो तसल्ली मिली...गर वंदन सीधे संपर्क करे,तो बात बन सकती है....एक सदमाही सही...हम सभीके लिए...लेकिन, जीवन आगे तो बढ़ सकता है....
उस राततक मेरे पती और बच्चे लौट आए....बच्चे अपनेआपमे इतने मशगूल थे, कि घरमे क्या हालत हैं, उन्हें महसूस ही नही हुआ...थके हुए थे...जल्दी सोभी गए...एक और रात गुज़र गयी....
अंतमे वो लम्हा भी आ गया जब वंदन हमसे रु-बी-रु हुआ....मै बता नही सकती कि, वो दिन मेरे लिए क्या लेके आया....
सारी बातें साफ़ होने लगीं...जो हमें बताया गया था, वो पूर्ण असत्य था...वंदन की पत्नी बीमार थी...वंदन उसे अस्पताल ले गया था...
और जिस व्यक्तीने वो ख़बर दी...वो? उसने क्यों ये सब कहा....वंदन ने उसे नोटिस दे दी थी....जिस अस्पतालसे वंदन जुडा हुआ था, उस अस्पतालमे उस व्यक्तीने कुछ बोहोतही अनैतिक हरकत की थी.....बस उसी बातका उसने बदला लेना चाहा..और हमारे अत्याधुनिक संपर्को के ज़रियों ने, उसने सोचाभी नही था, उतना उसका काम आसान कर दिया...
मेरा ईश्वरके ऊपर, उस विराट शक्तीके ऊपर, तो विश्वास औरभी बढ़ गया...लेकिन, इन संपर्को के ज़रियोंपर कितना विश्वास हमने करना चाहिए....ये सवाल खड़ा कर दिया...आगाह कर दिया उन ४८ घंटोंने....हमें जबतक हमारा अपना, अपने मुहसे कुछ नही कहता....वोभी आमने, सामने...किसी औरपे विश्वास नही रखना चाहिए...हमारी ज़िंदगी तबाह हो सकती है...
दुआ करती हूँ, ऐसा भयानक दौर किसीके ज़िन्दगीमे ना आए.....आज वंदन और निम्मी हमें उतनेही प्यारे हैं...जितनेकी कभी थे....अच्छा हुआ..मुझे ईश्वरने सही बुद्धी दी, कि, मैंने निम्मीके सास-ससुरसे संपर्क नही किया...वरना, उन्हें, उनके बुढापे मे ना जाने कितना अधिक सदमा मिल जाता....अच्छा हुआ कि, उस व्यक्ती के पास उनका नंबर नही था....वरना उसने उन्हें जीते जी मार दिया होता....
समाप्त।
Saturday, August 1, 2009
ये कहाँ आ गए हम ?३
मै निम्मीकी सहेली थी...उसके सास ससुरके लिए, मैभी उनकी बेटीही थी...जब भी उन लोगोंसे मिली, उन्हों ने उसी प्यार और अपनेपन से मुझे गले लगाया था....आजभी....मेरे बच्चों को अपनेही नवासा-नवासी माना.... .....जोभी हो, उनके प्यारमे बेहद निश्चलता थी.....कोई दिखावा नही, कोई बनावट नही....ऐसे इंसानों के साथ क्यों किस्मत ने ऐसा छल किया? एकही एक ऑलाद, और वोभी छिन गयी??
खैर...! वंदन, उन सबसे पहली बार मिल रहा था...मैंने अपनी आँखोंमे भर आए आँसू छुपाते हुए, उनका वंदन से परिचय कराया.....निम्मीकी दोनों बेटियाँ भी बडीही स्नेहमयी थीं...बड़ी ज़रा मोटू..छोटीवाली छरहरी....मेरे बच्चे शायद ज़रा अंतर्मुख थे...लेकिन इन दो लड़कियों ने पलभर मे ऐसा मौहोल बनाया मानो, उनका रोजमर्रा का मेलजोल हो....!
मेरे पती शेहेरके बाहर गए हुए थे....अगले दिन शामको लौटने वाले थे...सोचा, देखते हैं...गर फिर एकबार हम सब इकट्ठे हो सकेँ तो...लेकिन, उनके आनेपरही इन सभीको बुलाना...इतना धीरज मुझमेही नही था....बेकरार हो उठी थी सबसे मिलनेके लिए....!
खाना कब परोसा गया...कब खाया गया...समय किस रफतारसे बीतता गया....पताही नही चल रहा था.....हर व्यंजनकी तहे दिलसे तारीफ़ करते हुए, निम्मीके सास-ससुरने भोजन किया....निम्मीकी बड़ी लडकी, मेरा बेटा और वंदन, तीनो शतरंज के अच्छे खिलाड़ी थे....निम्मीकी छोटी लडकी को संगीत और नृत्य मे बेहद रुची थी....
उसे मेरा तबला और पेटी दिख गयी..मैंने तो उन्हें छूना पता नही कबसे बंद कर दिया था....वो जब हाथ धोने मेरे कमरेमे गयी तो उसने ये साज़ देख लिए....मुग्धता से उन्हें निहार रही थी, और मेरी नज़र पड़ गयी....मैंने कहा,
" क्यों, मन है इन्हें एकबार सुरमे लानेका?"
"जी, मासी...बोहोत...मै बजा सकती हूँ???"मुग्धाने मुझसे पूछा...हाँ, उसका नाम मुग्धाही था...
"बच्चे, ज़रूर...इनकी तो किस्मत खुल गयी...!" मैंने खुश होके कहा...
उसने पलकीभी देरी नही की....नाही उसे कोई झिझक थी....हारमोनियम को सुरमे लाके, उसने तबलेपेभी अपना हाथ आज़माया...साथ मीठी, सुरीली आवाजमे गुनगुनाती रही...
इधर मेरा बेटा, निम्मीकी बड़ी बेटी, शुभ्रा और वंदन शतरंज लेके बैठ गए....वैसे खेल तो शुभ्रा और वंदन रहे थे, लेकिन मेरे बच्चे, दोनोंके बीछ टांग अडा रहे थे....शुभ्रा वंदन को चेकमेट देनेही वाली होती,कि, मेरा बेटा, उमंग, वंदन को आगाह कर देता...और शुभ्रा चिल्लाके मुझे पुकारती...,
" मासी...इसे यहाँसे हटाओ ना...देखो इसने तीसरी बार, मेरा बँटा धार किया है.....!"
मै उसे वहाँसे हटनेके लिए कहती तो वंदन, उसे खींचके अपने पास बिठा लेता...मेरी बिटियाने शुभ्राको आगाह करना शुरू कर दिया...हालाँकि वो, (मोहिनी),इतनी माहिर नही थी, जितना कि मेरा बेटा...
चायका समय होने आया तो मैंने पास जाके सारे मोहरे उलट पलट दिए.....!तब कहीँ जाके वंदन उठा और हमलोगोंके साथ आ बैठा.....निम्मीके सास-ससुर, खानेके बाद कुछ देर आराम करने कमरेमे चले गए थे...मै चाय बनाने रसोईमे मुडी तो निम्मी और वंदन, दोनों मेरे साथ आके खड़े हो गए ......
बातचीतका एक अलगही दौर चल पडा....जिसने हमारे बचपनकी और रुख किया...और फिर अपने, अपने जीवनके उतार चढाओं के ओर मुड़ गया....
कई घटनाएँ ऐसी थीं, जिनसे वंदन वाक़िफ़ नही था...और उसके अपने जीवनमे काफ़ी कुछ था, जिससे मै और निम्मी वाक़िफ़ नही थे.....
हम तीनों बातों मे लग गए तो हमारे बच्चों ने बिन कहे, चाय-नाश्तेके दौरको अपने आप सँभाल लिया...अपने दादा-दादीको चाय नाश्ता परोस दिया....उन्हें बगीचेमे ले गए....पताही नही चला कि, कब शाम गहराती गयी....
"चलो, हम सभी रातका खाना कहीँ बाहर खा लेते हैं....!"
"हाँ, हाँ, ऐसाही ठीक रहेगा...चलिए मासी, आपकोभी थोडा आराम मिल जायेगा...", मुग्धा बोल पड़ी.....निम्मीनेभी ज़ोर दिया...सबका यही विचार था कि, कुछ और समय इकट्ठे बितानेके लिए मिल जायेगा....
निम्मीके सास-ससुरने कहा," भई, हमलोग तो रातमे मुश्किल से कुछ खाते हैं...और वैसेभी दोपेहेरका भोजन अभी हज़म नही हुआ...हम दोनोको तो गेस्ट हाउस छोड़ दो...तुम सब घूम आओ.."
मेरे बेटे उमंगने कहा," पर हम चारों कहीँ और जाएँगे...आपलोगोंके साथ नही.....ममा...हमने तो सोच लिया कि, मल्टीप्लेक्स मे जाके १० बजेका शो देखेंगे.....चलेगा ना?"
सब इस तरहसे हिलमिल गए थे कि, मेरे ना कहनेका सवालही नही उठता था....
निम्मी मुझसे बोली," उफ़! तू मेरी साडी तो देख...कितनी चुम्हला गयी है...कैसे लगेगी....?"
"तो क्या? तू मेरी कोई साडी पेहेन ले....चोली तो एकदम अच्छी है...इसी चोलीपे मेरी ४/५ साडियाँ पहनी जा सकती हैं...चल आ मेरे कमरेमे...और चुन ले....!"मैंने उसे खींचके उठाते हुए कहा....
"मतलब तुम दोनों तो खूब सज सँवर लोगी और मै ऐसेही चलूँ...? या तो तुम दोनोका ड्रायवर लगूँगा या बॉडी गार्ड.... ........!"वंदन कह उठा....
" अब चल भी ...ज़्यादा नाटक नखरे मत दिखा...", मै बोल पड़ी...
"मुझे कमसे कम मुँह हाथ धोनेका तो मौक़ा दोगी या नही तुम दोनों..?"
वंदन ने बड़े नाटकीय ढंगसे हाथ जोड़ते हुए कहा....
" हाँ, हाँ....लो, चलो, मौक़ा और तौलिया दोनों हाज़िर हैं..!."मैंने स्नानगृह की ओर इशारा करते हुए कहा.....
चंद मिनटों मे सब तैयार हो गए....बच्चों ने अपना रुख कर लिया...हम तीनों ने पहले, माँ और बाबूजी को गेस्ट हाउसपे छोडा और फिर एक ज़रा शांत होटल की तलाशमे निकल पड़े.... चयन का काम तो मुझपेही सौंपा गया....
याद नही कि तक़रीबन चार घंटे कैसे बीत गए.....वंदन, जोकि, दूसरेही दिन लौटने वाला था...और दो दिनों के लिए रुक गया....इधर मेरे पतीकी वापसी ३ दिनोंके लिए और आगे मुल्तवी हो गयी...वंदन चाह रहा था, कि, इनसे मिलता जाय ...पर आसार नज़र नही आ रहे थे....
मै मनही मन खुश थी कि, निम्मीको अपने दुखोंसे, यादों से, कुछ तो निजात मिल रही थी....उसकी उदासी किसी परछाई की तरह, उड़न छू होते जा रही थी.....फिरभी, बेमौसमकी बदरी की भाँती, लौटभी आती....लाज़िम था....घाव हरा था...बहने लग जाता....
अगले दिनका क्रम हमलोग तय कर रहे थे......जितनाभी समय हमलोगोंके पास था, हमने इकट्ठे ही बिताना था...ऐसा मौक़ा फिर मिले ना मिले....किसीको कोई ऐतराज़ भी नही था....निम्मीके सास-ससुर तो निम्मीके लिए खुश ही हो रहे थे....हम बिछडे इस तरह से मिले थे, जैसे कभी जुदा हुएही न हों.....इन दो-तीन दिनोंमे कितना कुछ घटनेवाला था, किसे ख़बर थी...?
क्रमशः
Friday, June 5, 2009
माँ! प्यारी माँ ! ५
रेडियो चल रहा था..'छाया गीत"...उसपे वही गीत बजा, जिसे मै अपनी बेटीकी बिदाई के समय बजाना चाह रही थी...ये दुआएँ उसके लिए कई बार कर चुकी थी,लेकिन बजा ना सकी...जब मै अपने नैहर से बिदा हुई, तो लगा, मेरे सारे अपनों के दिलसे वही दुआ निकल रही है मेरे लिए...'बाबुल की दुआएँ लेती जा , जा तुझको सुखी संसार मिले, मैके की कभी ना याद आए, ससुराल में इतना प्यार मिले...!'
"रफी ने इसे रो रोके गाया था...संगीत निर्देशक इस गानेको धनिमुद्रित कर रहे थे, तो गाते समय, रफी साहब सिसक,सिसक के रोने लगे.....उनसे पूछा गया, कि वे क्यों रोने लगे?
उन्हों ने कहा,'हालही में मेरी बेटीकी मँगनी हुई है...सोचने लगा,कि, वो चली जायेगी, तो मुझे कैसा लगेगा??....यही सारी दुआएँ मेरे मनसे निकलेंगी...'
सगीत दिग्दर्शक ने उनसे कहा, 'आप इसी तरह गा लीजिये...गीत ऐसेही ध्वनि मुद्रित होगा...!'
और वो गीत रफी साहबने सचमे रो, रो के गाया है!!
"अम्मा ! मुझे नही पता, कि, आपने इस गीतको कभी गौरसे सुना या नही...अबकी आओगी तो ज़रूर सुनाऊँगी.....
क्या गज़ब गाया है..सचमे अपनी बेटीके लिए उसके प्रिय जनों के मनमे यही सब आता होगा...और अब जाना, जब मेरी बिटिया ब्याही गयी.......मेरे मनमे भी यही सब आया..."मेरे बाग़ की अए नाज़ुक डाली !तुझे हरपल नयी बहार मिले...!"
"मै सारा गीत यहाँ लिख सकती हूँ,ऐसे भावपूर्ण अल्फाज़ हैं, और उन्हीँ भावों को समेटे गाया गया है....
आप अपने घरसे बिदा हुईं तब आपके अपनों के मनमे भी यही सब आया होगा...'काँटा भी ना चुभने पाये कभी, मेरी लाडली तेरे पाओं में ........'... हैना?
जानती हूँ, कि, आपके सारी उम्र काटों पे चलके कटी.....आपने, खासकर आपके साथ,साथ, दादा-दादी अम्माने, मेरे लिए ऐसीही दुआएँ माँगी...जानती हूँ...फिरभी मेरा सफर काँटों की राहों से गुजरा....के राह मैंने ख़ुद चुनी थी...आपके लिए तो चुनी गयी थी....
"आप अपने खानदाँ की सबसे सुंदर हुनरमंद बेटी थीं...फिरभी राहोंमे फूल बिखरें हो...मुझे तो नज़र नही आए...अफ़सोस के ऐसी दुआ आपको लगी नही...नानी अम्मा को कितना दुःख होता होगा हैना? जानती हूँ, समझ सकती हूँ, मुझे देख आपको कितना दुःख होता रहा ..मैंने देखा है....
"चश्मे-बद-दूर...! शायद आपकी नवासी को ये दुआ लगी....या वो अधिक परिपक्व और संजीदा निकली...जोभी हो...ईश्वर उसे वो सब दे, जिसकी वो हक़दार है...
"अम्मा ! सारी उम्र भी आपके बारेमे लिखने के लिए कम है....हर रोज़ कुछ ना कुछ याद आताही है...आज आपकी बेटी, अपनी माँ के स्वास्थ्य के लिए दुआएँ माँग रही है.....कमसे कम आपको दर्द और तकलीफ तो ना हो...क्या ऊपरवाला मेरी इतनी दुआ सुनेगा?"
आ गयीं..बरखा रानी!!
और बागवानी की वो शाम भी..पिछले जून माह की..... जब मेरी बिटिया साथ थी...और मैंने बागवानी शुरू कर दी थी...
आज वही बिटिया, तन और मन से दूर है...मेरे मनसे नही..लेकिन मै उसके मनसे...अभी,अभी, खिड़कियाँ बंद करके लौटी और लिखने लग गयी....
उस शाम की तरह, मेरी बिटिया रानी, तुझे आजभी दुआएँ देती हूँ...और देते,देते, आँखे भी भी पोंछ लेती हूँ...!
कैसा अजीब मौसम होता है ये...कभी तो बिटिया याद दिला देता है...कभी माँ, और माँ का घर, वो दादा, वो दादी...!...कभी बच्चों का बचपन तो कभी अपना बचपन....! और बचपनका आँगन !
एक आँख से रुलाता है...एकसे हँसाता है...!
समझ नही पा रही, कि, ये बातें, "बागवानी " इस ब्लॉग पे पोस्ट करूँ, या "संस्मरणों"मे....!
"माँ, प्यारी माँ", ये संस्मरण तो जारी है..." बागवानी" की याद , यहाँ, पोस्ट करनेसे खुदको रोक नही पाई...
Monday, June 1, 2009
माँ, प्यारी माँ...!३
हाँ, वही क़िस्सा बयाँ करनेके खातिर आज लिखना शुरू किया....
पता नही क्यों,रायभान को बस्ती परके सारे बच्चे, हिक़ारत से देखते थे...उसके साथ बुरी तरहसे पेश आते थे...जैसे कि,वो बतख की कहानी...उन बतखों मे एक हँस था..जिसे सब कुरूप कहते थे....रायभान की माँ, हमारे घरमे काम करती थी....
"सब बच्चे हमारी घरकी सीढियों पे बैठ, कुछ खेल रहे थे...मै बगीचे से आयी और सीढीयाँ लाघते हुए, रायभानको एक लात मार दी...बेचारेने," अरे, हटता हूँ, हटता हूँ," कहा और हट गया...
अम्मा, आप सब देख रहीँ थीं...आपने अन्य बच्चों को एक तरफ़ बिठा दिया ...मुझे और रायभानको अपने सामने बुलाया...
"मुझसे बोलीं," इसके सामने कान पकडके १० बार उठक बैठक करो, और हर बार माफी माँगो...कहो,कि, ऐसी हरकत फिरसे कभी नही करोगी..!"
"बेचारा रायभान बडाही सकुचाया-सा एक कोनेमे खड़ा हो गया...
"आपके आगे मना करनेका तो सवालही नही था..जैसा आपने कहा वैसाही मैंने किया......
उसके बाद आपने सब बच्चों को अपने,अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास,प्यारसे लेके बैठीं और कहा," देखो बेटा, खुदाके आगे सब बच्चे एक जैसे होते हैं...और तुम्हें उसे लात मारके ख़ुशी मिली? तुमने हरकोई उसके साथ ऐसीही चाल चलता है ये देखा और वैसाही किया...हैना? '
"अम्मा, ये शत प्रतिशत सच था...मै खामोश बैठी रही...मेरी उम्र थी कुछ ३ सालकी...लेकिन मैंने ग़लत बात की है, ये मै खूब समझ गयी...
"उस रात मेरे गलेसे खाना उतरा नही..दादा पूछते रहे,कि, मै क्यों खाना नही खा रही...
आपने कहा," कोई बात नही गर एक रात नही खायेगी तो...उसने शामको दूध तो लेही लिया है...फलभी खाया है...नही खा पा रही,तो उसे सो जाने देते हैं।'
"दूसरे दिन सुबह हुई,तो मैंने अपनी माँ और पिताको घरसे नदारत पाया....दादी को पुकारने लगी...वो आ गयीं....
मैंने उनसे पूछा," अम्मा और बाबा कहाँ गए हैं? और वनुमासी,(रायभान की माँ,) क्यों नही आयी? आप क्यों नाश्ता बना रहीं हैं?"
दादीअम्मा ने कहा," तुम्हारे अम्मा -बाबा किसी वजहसे अस्पताल गए हैं...!"
बाबा तो कुछ देर बाद लौट आए...आप नही लौटी....
शाम हुई तो मैंने ज़िद की," दादी अम्मा मुझे बस्ती परके बच्चों के साथ खेलना है...उन्हें बुलाओ ना...और रायभान से मुझे,'डम डम डिगा,डिगा ये गाना भी सुनना है..."
दादी अम्माने मुझे समझाते हुए कहा, " आज नही...अभी कल देखेंगे....! चलो आज मैही तुम्हें कहानी भी सुना दूँगी, और खाना भी खिला दूँगी.."
"अम्मा आप देर रात किसी वक़्त आयीं ...मुझे ठीकसे पता नही चला, लेकिन आपको मेरी बग़ल मे पाके बड़ा सुरक्षित लगा..
"सुबह मेरी आँखें खुली, तो फिर आप मेरे पास नही थीं ...मुझे बस्ती परसे रोने धोनेकी आवाजें आ रहीं थीं...मै कुछ समझ नही सकी...जानती थी,कि, बस्तीपरके कई मर्द अपनी बीबिओं को मारते हैं..ऐसेमे वो रोती,रोती माँ या दादी के पास आती थीं..अब जब माँ ख़ुद बस्तीपे मौजूद है,ये मुझे बताया गया, तो मुझे बेहद हैरानी हुई,...माँ के होते हुए भी क्या उन औरतोंको मारा जा रहा है?
मैंने दादी अम्मासे कहा," मुझे बस्तीपे जाना है...मुझे जाने दो ना.....!"
"दादीअम्मा ने मुझे अपनी गोदीमे लेके कहा," अभी नही...शामको देखेंगे......"
"लेकिन आप कलसे मुझे रोक रहीं हैं..मुझे वो गाना सुनना है रायभान से...उसे तो बुला लो ना..!"मैंने अपनी ज़िद कायम रखी......
"अंतमे दादी अम्मा ने शायद सोचा कि, मुझे चंद बातें औरोसे पता चलें, उस बनिस्बत, वो खुद्ही बता दें तो बेहतर होगा......
"वो कहने लगीं,तो मैंने गौरसे उनके चेहरेकी ओर देखा...उनकी आँखों मे पानी था..होंठ काँप रहे थे,....... उन्हों ने कहना शुरू किया," बच्चे, रायभान अब फिरसे यहाँ कभी नही आयेगा.......!"
"लेकिन क्यों? मैंने उसे लात मारी थी इसलिए? मैंने माफी तो माँगी थी..दादी अम्मा आप उससे कहो ना,कि, मै फिरसे ऐसा नही करूँगी.." मुझे अब रुलाई-सी आने लगी थी...
"दादी अम्माके आँखों से अब पानी बहने लगा था...वो बोलीं," रायभान अब भगवान् जी के पास चला गया है! वो दोबारा हमें कभी नही दिखेगा....!"
मेरा मन एकदमसे धक्-सा रह गया..मै इतना जानती थी,कि, एकबार जब कोई "भगवान्" या "खुदाके" पास जाता है तो फिर कभी नही लौटता...! मुझे यक़ीन हो गया कि,वो मुझीसे रूठके चला गया....मेरे बाल मनपे जो उस समय गुज़री, उसका बयान करना कठिन है.....
"बादमे पता चलता रहा...वनुबाई ने चुल्हेपे बड़े-से पतीलेमे, नहानेके लिए पानी गरम करने चढाया था...रायभान और उसकी छोटी बेहेन छबी, वहीँ पे शायद कुछ उधम मचा रहे थे...वो खौलता पानी, चुल्हेपरसे उलट गया और दोनों बच्चों पे जा गिरा...छबू तो बच गयी...रायभान ईश्वर को प्यारा हो गया....
"मुझे याद है, मै, बोहोद दिनों तक सदमेमे चली गयी थी..खानेके लिए जैसे मुझे बिठाया जाता था, मुझे उबकाई आ जाती थी..मुझे अन्य एक बच्चे ने बताया था,कि, रायभान को भूक लगी थी, इसलिए वो अपनी माँ के पास पोहोंचा था..रोटी माँगते हुए...मुझे अब तो याद नही,कि, मै कितने दिन खाना नही खा पायी....
"अम्मा, अगर आप उस शाम मुझसे माफी ना मँगवाती,तो ताउम्र मै पश्च्यातापकी अग्नीमे जलती रहती...कभी खुदको माफ़ करही नही पाती...आजभी वो सारी बातें मेरे मनमे ऐसे अंकित हैं, जैसे कल परसों घटी हों....
सोचती हूँ, मैंने ऐसी हरकत कीही कैसे? क्या सवार था मुझपे? सिर्फ़ किसी अन्य की देखा देखी कर दी? लेकिन,जब कभी मुझे ये बात याद आती है तो शर्मसार हो जाती हूँ...जब कभी, डम डम डिगा, डिगा ये गीत बजता है,तो रायभान का भोला-सा चेरा सामने आ जाता है..."
क्रमश:
वर्तनी के लिए माफी चाहती हूँ..कोशिश तो की है, फिरभी गर कुछ typos रह गए हों,तो क्षमाप्रार्थी हूँ!
प्रस्तुतकर्ता shama पर 11:39 AM संदेश का संपादन करें">
लेबल: पश्च्याताप, प्यारी माँ, माँ, माफी., शमा, संस्मरण, हिन्दी
माँ, प्यारी,माँ! १
बेटीपे लिखा..एक माँ ने..अब एक बेटी अपनी माँ को याद कर ,उसके बारेमे लिखना चाह रही...
चाह तो बड़े दिनों से थी..और ऐसा नही,कि, पेहले लिखा नही..पर ये कुछ नए सिरेसे..एक बेटी, जो,माँ होनेका दर्द झेल रही है....और अपनी माँ का दर्द समझ रही है..उसका बड़प्पन याद कर रही है..उसकी कई बातें, आज मेरे सामने एक दीप शिखा बन खड़ी हो गयीं हैं...
कई बार चाहा,कि, एक औलाद, मुझेभी, याद करे,कुछ इसीतरह, जब भी, किसी अन्य को अपनी माँ को याद करते हुए,पढा,या सुना...शायद, वो मेरी किस्मत नही...
इस आलेखमे, कुछ उन्हीं के अल्फाज़ ,जो,खतों के रूपमे मेरे पास हैं...या बोलोंके रूपमे मुझे याद हैं...उन्हीं को ,उजागर करना चाह रही हूँ..लेकिन,सिर्फ़ उतनाही नही...औरभी बोहोत कुछ...
वोभी मेरे लिए,कितनीही बार फानूस बनी...अपने हाथ जला लिए,ऐसा करते, करते...ज़रूरी नही था,कि, मैनेही उन्हें जलाया हो...लेकिन,हाँ, जाने-अनजाने ये ख़ता मैंने ज़रूर की है...
उनका हर किया,अनुकरणीय ही था,ऐसाभी नही...लेकिन, वो नही था, येभी,कई बार, उन्होंने ने ख़ुद दिखलाया...
आज इससे अधिक लिखनेका समय नही....उनके बारेमे,इत्मिनानसे ही लिखना होगा..दिल भर,भर आता है...
उनपे, उतारा गुस्साभी याद आता है..अपनी हताशा भी याद आती है....
क्रमशः
Posted by Shama at 9:18 AM
Labels: प्यारी, फानूस., माँ, लेख, शमा, संस्मरण, हिन्दी
Tuesday, May 26, 2009
मात्रु दिवस...१
Saturday, May 9, 2009
कई बार ऐसी यादें घिर आती हैं अतीतके गर्दिशमेसे उभरके...के बेसाख्ता बह निकलती हूँ...
येभी नही समझमे आता कि किस क्रममे लिखूँ..इस्तरह्से एक बाढ़ आती है....
शायद जो क़रीबका अतीत होता है,वो ज्यादा छलता है...
इसीपे एक मालिका शुरू करने जा रही हूँ..जहाँ एक मुक्तीधारा बेहेने दूँगी..अनिर्बंधित...लेकिन, साफ़ इतनी के जिसकी गहरायीका एहसास ना हो...पूरी पारदर्शक....लेकिन सिर्फ़ अपनेआपको कुरेदूँगी.....किसी औरको नही...के ज़िंदगी ने समझाया, वो मेरा अधिकार नही...
सुनती आयी हूँ, मात्रु दिवस के बारेमे, पिछ्ले कुछ सालोंसे....
मेरी अपनी बेटीके जनम दिवस के पासही होता है..बल्कि,उसी दिन....
जिस दिन वो जन्मी, एक माँ जन्मी....इसलिए हम दोनोका जन्म दिन तो एकही दिन होना चाहिए...
शायद मेरी माँ और मेरा जनम दिन भी एकही दिन होना चाहिए..कि मैही उनकी पहली औलाद थी...
उस दिन वो, मेरी लाडली, मुझे कितना याद करती है, करतीभी है या नही, मुझे नही मालूम...
हाँ, मुझे ज़रूर याद आती है...दिल करता है उसे पूछूँ ," क्या मैभी तुझे याद आती हूँ, मेरी बिटिया? या तेरी ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार तुझे इतनी मोहलत ही नही देती....ना देती हो तो, शिकायत भी नही..
तेरा जन्मदिवस तो मै भूलही नही सकती...कि एक माँ का उस दिन जन्म हुआ था..मातृत्व क्या होता है,इसका एहसास हुआ था...
बोहोत कुछ बताने कहनेका मन है तुझे...लेकिन डर भी जाती हूँ...अब तू बड़ी हो गयी है...शायद मुझसे अधिक सयानी....
बचपनको याद करती हूँ तेरे..तो अनायास आँखें भरही आती हैं...बोहोत तेज़ीसे फिसल गया मेरे हाथोंसे..मेरी बाहोंसे...अपनी बाहों में तो तुझे ठीकसे भरभी नही पाई..ये ज़िंदगी की ज़ंजीरे थीं, जो मेरे हाथ बाँधे हुई थीं..लेकिन मनकी अतृप्त इच्छाएँ, कभी तो अपने खूने जिगरसे, अपने जिगरके तुकडेके नाम ज़रूर लिखूँगी....
लिखूँगी, के, तेरे साथ क्या, क्या खेल रचाना चाहती थी...तेरे साथ खेलके तुझे खिलखिलाना चाहती थी..और चुपचाप अपने आँचल से अपने आँसू पोंछ लेना चाहती थी..
गुड्डे गुड्डी के ब्याह रचाना चाहती थी...झूट मूटकी शादी...झूट मूट की बिदाई...झूट मूट की दावतें...झूट मूट के खाने, वो निवाले,जो तू मुझे खिलती, और पूछती," माँ, अच्छा लगा?"
मै गर कहती,"हाँ, बोहोत अच्छा लगा,"तो तू झट कहती,
"तो लो मुँह खोलो, और खाओ",...फिर एक झूठ मूट का कौर...
हूँ...ये खेल तो खेलेही नही गए...और अब क्या खेलेंगे?
क्रमश:
1 comments:
मात्रु दिवस ३
Tuesday, May 12, 2009
बिटिया आज तेरा जनमदिन...आज एक माँ का भी जनमदिन...के तूने मुझे माँ बनाया...
बनारसकी चिलचिलाती दोपहरी....सिज़ेरिअन सेक्शन से तेरा जनम होगा ये तय कर लिया गया था..मेरी मानसिक हालत और तेरे पैर आगे देख, यही वैद्यक शास्त्र की दृष्टीसे सही था..
मेरे होमिओपथ ने काफी कोशिश की ये सर्जरी टल जाय...दवाई देके तेरा सर घुमानेकी ...ये तो खैर पता तो नही था कि, लड़का है या लडकी....लेकिन मुझे कोई फर्क नही पड़नेवाला था...हाँ, मेरे ससुरालवालों को पड़नेवाला था...और पडाभी.....तेरे आगमन की ख़बर तेरे पिताने एक बडेही अपराध बोधसे ,तेरी दादीको सुनाई......और मेरा मन छलनी,छलनी हो गया...किसीने उन्हें बता रखा था, की, मुझे २ लड़केही होंगे...
मुझे याद, OT में तेरी "तैय्या"को अन्दर नही आने दिया तो मैंने कितना उधम मचा दिया था...एक डॉक्टर और मेरी शुभ चिन्तक की हैसियत से मेरा सिर्फ़ मेरी उस जेठानीपे ही विश्वास रहा था...मुझे, शायद, बहलाए रखनेके लिए, भरोसा दिया गया था,कि, भाभी को OT में आने दिया जायेगा...
पता चला कि, मेरी डॉक्टर को तो ऐतराज़ नही था..लेकिन अनेस्थीशिया देनेवाले डॉक्टर की मर्जी नही थी...मुझे ज़बरदस्ती पकड़ रखा गया और बेहोशीकी दवा सुंघाई गयी...पता नही मैंने कितनी देर साँस रोके राखी थी...
जब होश आया तो मै OT के बाहर थी...
वो ward,जहाँ मुझे रखा जानेवाला था, दूसरी इमारतमे था...तुझे तो बिना किसी आवरण केही मेरी माँ के हाथ पकड़ा दिया गया था...उन्होंने एक आयासे उसका एप्रन माँगा...!
दोपेहेरकी, बनारसकी गरमी...१ बजके २० मिनट पे तेरा जन्म...२ बजेके करीब, मुझे दूसरी इमारत में ले जाना था..अजीब आवाज़ें मेरे कानोंमे आ रही थीं.."इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग में हम स्ट्रेचर नही देते...आपको वहाँ से मँगवाना होगा.."
भाभी बरस पड़ीं," अरे तो क्या इस औरत को चलाके भेजोगे? वो भी नही दे रहे स्ट्रेचर...! और सिज़ेरिअन का बच्चा तो इतना नाज़ुक समझा जाता है...उसकी तो किसीको चिंताही नही..."
खैर..इतना याद है,कि, मुझे दो बार एक स्ट्रेचर परसे दूसरेपे डाला गया..मतलब उस बिल्डिंग से OT की बिल्डिंग के बीछ, एक स्ट्रेचर आया ..वहाँसे मुझे उसपे शिफ्ट किया गया...ये सब बादमे पता चला...
और दिनों डॉक्टरों की स्ट्राईक चल रही थी...उनका कहना था,कि, गर प्राइवेट ward के मरीज़ों से अधिक पैसे लिए जाते हैं, तो डॉक्टर्स कोभी उसी मुताबिक तनख्वाह या मेहताना मिलना चाहिए...
दूसरी ओर १२ से १५ घंटे बिजलीका गुल होना साधारण बात थी...और मुझे जिस पलंग पे रखा गया उसको सटके एक टीबी की मरीज़ थी..ये तो भाभीकी आदत थी ,कि, वो अन्य मरीज़ोंके बारेमे अपनी जानकारी रखतीं..गर वो ना होती तो किसकी सुनवाई नही होती..!
इसके पूर्व मुझे जो जगह दी गयी,थी वो एक छोटा -सा अलग ward था...भाभी ने पूछताछ की," यहाँ पहले कौन था?"
एक नर्स ने बताया," यहाँ एक सेप्टिक का मरीज़ था...कुछ घंटों पूर्व उसकी मौत हो ......"
भाभी तकरीबन चींख पडी," अरे ये क्या बकवासबाज़ी लगा रखी है..! इस मरीज़ कोभी मार देना है क्या? इससे तो जनरल ward ठीक है..हमें क्या पता था,कि, यहाँ इतनी अंधेर नगरी है....! इस अस्पताल के management की तो मत मारी गयी है..सिज़ेरियन का बच्चा तो वैसेही इतना नाज़ुक होता है..और बच्चों के बनिस्बत उसमे प्रतिकारशक्ती कम होती है...और यहाँ तो सीधे सेप्टिक ward में उसे रखा जा रहा है...इसे disinfect भी किया था के नही.....? या ऐसेही सीधे अगले मरीज़ को घुसा दिया....?"
नर्सने कुछ कहनेसे मनाही कर दिया..ज़ाहिर था...कमरेको sterilize नही किया था...!
ये अंधेर नगरी ही थी....!!!
आज मुड के देखती हूँ, तो लगता है, गर भाभी,( जिन्हें तू बादमे, तैय्या कहने लगी, क्योंकि, ताईजी बोलना नही आता था), और मेरी माँ नही होती, मेरे साथ, तो शायद तू मेरे हाथ नही लगती...
माँ तो अपना घरबार छोड़ मेरे पास महीनों आके रुकही गयीं थीं...पहले ३ गर्भपातका इतिहास था...और भाभीभी अपने ८/९ सालके बच्चे को छोड़ लगातार मेरे पास दौडे चली आतीं...वो दिल्लीमे कार्यरत थीं...और उनकी पेड़ छुट्टी ख़त्म हो गयी तो उन्होंने बिना तनख्वाह छुट्टी ले ली थी....नही पता कि हमारे किन जन्मोंके रिश्ते थे...जो वो निभा रही थीं...
देखा जाय तो तेरी तैय्या, मेरी सासकी सौतेली बेहेनकी बहु थीं...लेकिन हमारे परिवारमे मै उन्हें सबसे अधिक प्रिय थी..उन्होंने वैसेतो हमारे घरके हर व्यक्तीके लिए बड़े कष्ट उठाये,लेकिन, उनपे इल्ज़ाम ज़रूर धरा गया कि, मै अधिक लाडली हूँ...प्यार नाप तौलके तो किया नही जाता...अपने फ़र्ज़ तो वो हमेशा बेक़ायदी से निभाती रहीं...
इसी बातपरसे एक बात याद गयी तो वो बताते चलती हूँ....
हम तब दिल्लीमेही थे...मेरे ब्याह को शायद एकही साल हुआ था...हम एशिया हाउस जहाँ भाभी रहती थीं, वो जगह छोड़ बंगाली मार्केट के इलाकेके टोडरमल squaire में शिफ्ट हो गए...यहाँ दो कमरे अधिक थे....
एक दिन तेरे पिताकी रातमे अचानक से तबियत बिगड़ी....भाभीका फोन लग नही रहा था...हम सभी परेशान थे , कि de- hydration ना हो जाय....इन्हें क़ै और मतली हुई जा रही थी..साथ,साथ दस्तभी.....कार तो मैभी चला सकती...के जाके भाभीको ले आऊँ...पर उस दौरान इन्हें कौन देखता? और अव्वल तो मेरे ससुराल का मेरी driving पे भरोसा नही था....!
मै ट्राफिक के नियमों नुसार गाडी चलाती...और दिल्लीमे ऐसा कोई चलन नही था...!
सभीको लगता गर,मै रेड सिग्नल पे रुक गयी, इशारा देकेभी, कोई ना कोई पीछेसे आके धड़क लेगा...गाली गलौच अलग होगी सो होगी...!मेरा क्या नुकसान होगा, इसकी परवाह तो नही थी, लेकिन कार को कुछ होता है,तो नुकसान उठाना पडेगा...ये डर!!
इसमे फैसला हुआ, दिनेश भैया को प्रचारण कर, हालत बताके,उन्हें अपनी byke पे एशिया हाउस भेजा जाय और,उनके पीछे बैठ भाभी आ जायें !
अब भाभीने इनके दोस्त दिनेश को, तो देखाही नही था!
दिनेश अपना परिचय जताते हुए, भाभीके घर पोहोंचा.....भाभीका फो बंद होनेके कारण हम तो इत्तेला देही नही सके थे....मैंने भाभीको एक छोटी -सी चिट्ठी लिख दी...बस वही एक प्रमाण....रातके २ बज चुके थे...दिल्ली शेहेरकी ख्याती तो सब जानतेही थे...मुम्बई में एक अकेली लडकी/औरत, बेझिझक टैक्सी पकड़, अपनी निर्धारित जगह जा सकती थी...लेकिन यहाँ?
भाभी हिम्मतवाली...उनसे बढ़के उनके पती काभी उनपे विश्वास...!
चली आयीं...दिनेशके पीछे सवार हो..लेकिन उतरी तो दखा, एक हाथमे चप्पल पकड़ रखी थी...!
कहने लगीँ," हमने सोच लिया था,कि, गर ये ज़राभी रास्ता बदलता तो मै उसे चप्पल जूती जो हाथ लग जाता, जमके पिटाई तो करही देती.....चलो...... भाई दिनेश , अब तू तो हमें माफ़ करही दे....मै तो हूँही ऐसी...!"
दिनेशने अपनी खैर मनायी......!उसकी ज़रा-सी गलती, और सिरपे जूती...!लेकिन भाभीकी हिम्मतका कायल हो गया........!प्रेमा भाभीका नाम सुनतेही,वो कहता है," हाँ...चप्पलवाली भाभी.....! उन्हें कैसे भूल सकता हूँ??सिर्फ़ सिरपे क्या, क्या पड़ता, वो बात छोडो, भाभी तो उन्हें पटकी खिला देतीं और दिनेश अपना ठीकसे बचाव भी नही कर पाता, ये जानते हुए,कि, भाभी किसकी हैं?
पतीको तो वो फिर एक रातके लिए भरती करवाकेही आयीं...
आज मेरे मनमे सवाल उठता है...भाभीकी हिम्मतकी सभीने तारीफ़ की...आजतक करते हैं....गर ये बात मुझे करनी पड़ती तो क्या मुझे इसतरह से जाने दिया होता? नही...ये दोहरी प्रतिक्रया है...मै चाहे कितनीही भले कामके लिए हल्का-सा खतरा मोल लूँ..तो उफ़! इतनी जवाबदेही..!
तो ऐसी तैय्या तेरे पास मौजूद थीं....मेरे पास मौजूद थीं ... जैसे फ़रिश्ता कोई हमारी रक्षा कर रहा हो....
काफी विषयांतर हो गया..लेकिन असलमे ये विषयांतर नही..ये व्यक्ति चित्रण है...
तो लौटी हूँ, उन्हीँ लम्होंमे..समय देखा जाए तो घड़ी पास आ रही है...इस वक्त...तेरे जन्मको बस १२ घंटे होनेवाले हैं...
माँ ने अपने हाथोंसे तुझे नेहलाया...
भाभीने जब मुझे, ले जाया रहा था, तेरे जनमके बाद तो पूछा," जानना चाहती हो है लड़का है या लडकी?
मैंने "नामे" सर हिला दिया.....उनकी बातें,जो मेरे कानपे आ टकरा जो गयीं थीं....
"तुम उसका चेहरा देखना चाहोगी?"
" अभी नही..." मैंने जवाब दिया...
मुझे मन था, जब इसे अपने आँचल में लूँगी, तभी जी भरके देख लूँगी...तब दुआओं के अलावा मनसे क्या निकलता?
एकेक बारीकी याद है मुझे.....कुछ भी नही भूली...कुछभी नही....
कैसे गुज़रे वो चंद दिन? मेरा घोर डिप्रेशन कहाँ गया? अब अगली बार.....
मेरे बच्चे, तुझे इतना कुछ कह देना है...किस छोरको पकडूँ, किस छोरको छोड़ दूँ?कैसे कहूँ,कि तूही मेरी दुनियाँ बन गयी...क्योंकि....तुझे इस बेदर्द ज़मानेसे मुझेही बचाना था/ होगा...हर गुज़रते लम्हे के साथ, इस एहसास की संगीनता नज़र आ रही थी....
क्रमशः
4 comments:
bahut hee hraysparshee manobhav . bina jiye samajhna isamjhana mushkil . matridivas par har matritva ko salam . aapke naam .
मेरे बच्चे, तुझे इतना कुछ कह देना है...किस छोरको पकडूँ, किस छोरको छोड़ दूँ?कैसे कहूँ,कि तूही मेरी दुनियाँ बन गयी...क्योंकि....तुझे इस बेदर्द ज़मानेसे मुझेही बचाना था/ होगा...
कितना सहज और कितना भावपूर्ण लिखती हैं आप शमा जी कि मन बहता ही चला जाता है प्रवाह में !बहुत खूब ! मेरे ब्लॉग पर कि गयी टिप्पणी में अर्थ के सम्बन्ध आपके विचारों का मैं सम्मान करता हूँ और सहमत भी हूँ !आपकी कहानियां पढ़ रहा हूँ आजकल !
shama ji , maa aur beti ke rishte ko aapne bahut hi achhe shabdo me darshaya hai .. man bheeg gaya aapke likhe shbdo se...
शमा जी आप इतना डूब के लिखती हैं की पाठक आपके साथ भावनाओं के सागर में गोते खाने लगता है...ये लेखन ही आपकी शक्ति है...जितना लिखेंगी उतनी ही ख़ुशी हासिल करेंगी...सुख के क्षणों को याद कर और दुःख के क्षणों को तटस्थ भाव से लिखें तो ही आनंद आएगा...क्यूँ की दुःख के क्षण लिखते समय अगर उसमें बह गयीं तो लेखन के साथ अन्याय होगा...
कभी ऐसे भी क्षण जरूर आये होंगे जब जीवन सार्थक लगने लगा होगा...उन क्षणों से भी तो पर्दा उठाईये कभी...
शुभकामनाओं सहित.
नीरज
मात्रु दिवस ४
Monday, May 18, 2009
रिश्ता था हमदोनोका ऐसा अभिन्न न्यारा
घुलमिल आपसमे,जैसा दिया और बातीका!
झिलमिलाये संग,संग,जले तोभी संग रहा,
पकड़ हाथ किया मुकाबला तूफानोंका !
बना रहा वो रिश्ता प्यारा ,न्यारा...
वक़्त ऐसाभी आया,साथ खुशीके दर्दभी लाया,
दियेसे बाती दूर कर गया,दिया रो,रो दिया,
बन साया,उसने दूरतलक आँचल फैलाया,
धर दी बातीपे अपनी शीतल छाया,कर दुआ,
रहे लौ सलामत सदा,दियेने जीवन वारा!!
जीवनने फिर एक अजब रंग दिखलाया,
आँखोंमे अपनों की, धूल फेंक गया,
बातीने तब सब न्योछावर कर अपना,
दिएको बुझने न दिया, यूँ निभाया रिश्ता,
बातीने दियेसे अपना,अभिन्न न्यारा प्यारा,
तब उठी आँधी ऐसी,रिश्ताही भरमाया
तेज़ चली हवा तूफानी,कभी न सोचा था,
गज़ब ऐसा ढा गया, बना दुश्मन ज़माना,
इन्तेक़ाम की अग्नी में,कौन कहाँ पोहोंचा!
स्नेहिल बाती बन उठी भयंकर ज्वाला!
दिएको दूर कर दिया,एक ऐसा वार कर दिया,
फानूस बने हाथोंको दियेके, पलमे जला दिया!
कैसा बंधन था,ये क्या हुआ, हाय,रिश्ता नज़राया!
ज़ालिम किस्मत ने घाव लगाया,दोनोको जुदा कर गया!
ममताने उसे बचाना चाहा, आँचल में छुपाना चाहा!!
बाती धधगती आग थी, आँचल ख़ाक हो गया,
स्वीकार नही लाडली को कोई आशीष,कोई दुआ,
दिया, दर्दमे कराह जलके ख़ाक हुआ,भस्म हुआ,
उस निर्दयी आँधीने एक माँ का बली चढाया,
बलशाली रिश्तेका नाज़ ख़त्म हुआ, वो टूट गया...
रिश्ता तेरा मेरा ऐसा लडखडाया, टूटा,
लिए आस, रुकी है माया, कभी जुडेगा,
अन्तिम साँसोसे पहले साथ हो, बाती दिया,
और ज़ियादा क्या माँगे, वो दिया?
बने एकबार फ़िर न्यारा,रिश्ता,तेरा मेरा?
जानती है, १२ मईको "तैय्याका" फोन आया था? वो तेरे बारेमे पूछ रही थीं! मुझसे रहा न गया...दिल भर आया ..मैं कुछ देर खामोश रही...तैय्या बार, बार पूछती गयीं...अंतमे भर्राई आवाज़मे मैंने कह दिया," भाभी वो मुझसे बेहद रूठी हुई है...पता नही वो मुझसे कभी सामान्य हो पायेगी या नही? "
तैय्याको ३१ साल पूर्व का वो बनारससे ,देहलीतक किया सफर याद आ गया....३० मईको मै तुझे लेके तैय्याके साथ, बनारससे देहली निकली थी...बिना आरक्षण किए...३रे दर्जेकी बोगीमे...देहली स्टेशन पे एक ऐसी भीड़ दिब्बेमे घुस पडी,की, मै और तैय्या तो बिछड़ ही गए...मै, बोगीके passege में तुझे ले गिर पडी...अपने शरीरको १२ दिनोकी एक नाज़ुकसी कलीपे ढाल बनाये रखा...मेरे उपरसे भीड़ गुज़र रही थी..तू डर और भूखसे जारोज़ार रो रही थी..एक मुसाफिरने मेरी हालत देखी...मानो फ़रिश्ता बन वो सामने या...हम दोनोको उसने खड़ा किया और कहा," अब मै अन्दर घुसनेवाली भीडको एक ज़ोरदार धक्का लगा दूँगा...आप उस वक्त डिब्बेसे उतर जाना...!"
गर वो ना होता तो पता नही, ज़िंदगी ने हमें वहीँ रौन्दके रख दिया होता.....तेरे कपड़े डिब्बेमे छूट गए..मेरे पैरोंमे चप्पल नही रही...
तैय्या platform पर नही उतर पायी...दूसरी तरफकी पटरियों पे उन्हें उतरना पडा..मै जैसेही platform पे उतरी...तेरे पिताके एक दोस्त हमें लिवाने आए थे..मुझे धीरज दिलाते हुए, एक बेंच पे बिठाया...मैंने तुझे स्तनपान कराया...कितनी भूकी प्यासी थी तू! ! मै आजतक वो दिन नही भूली...एक नन्हीं जान अपनी माँ पे कितनी निर्भर होती है..कितनी महफूज़ होती है, उसके आँचल में! !
मैं भी कभी ऐसीही महफूज़ रही हूँगी अपनी माँ के आँचल में....मुझे आजभी अपनी माँ का आँचल , हर धूपमे छाया देता है..काश मेरे जैसा नसीब तेराभी हो..कि तूभी...फिर एकबार, मेरे होते, अपने आपको उतनाही महफूज़ महसूस करे!!!काश..काश..मेरी इतने बरसों की अराधना सफल रहे....
जानती हूँ, तेरा जीवनसाथी, तेरे लिए एक विलक्षण सहारा है..वो बना रहे..तुम दोनों बने रहो..किसी अदृश्य रूपसे मेरी दुआएँ तुमतक पोहोंचतीं रहेँ...आमीन!
मै लिखना चाहूँ,तो और पता नही कितना लिख दूँगी..पर अब बस..इसके पहलेभी काफी लिख चुकी हूँ..कितना दोहराऊँ?
समाप्त।







शमा जी ,मेरे गीत पर आपकी अमूल्य टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !आपके आलेख ध्यान से पढ़ रहा हूँ और चमत्कृत होता जा रहा हूँ ! माँ ,बेटी ,दादा के परम आत्मीय संस्मरणों से लेकर police reforms जैसे जटिल विषय पर कलम चलाना इतना आसान तो नहीं होता परन्तु आपने इसका निर्वाह बहुत ही कुशलता से किया है और आप निश्चय ही इसके लिए प्रशंसा की पात्र हैं ! मेरी हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ स्वीकारें !