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Tuesday, December 15, 2009

बुलबुल का घोंसला...!



इस बोनसाय के पेड़ के साथ बडीही मधुर यादगार जुडी हुई है....इस बात को शायद १० साल हो गए...एक दिन सुबह मै अपने इन "बच्चों" के पास आयी तो देखा, इस पेड़ पे बुलबुल घोंसला बना रही थी...!कितने विश्वास के साथ....! इस पँछी का ऐसा विश्वास देख, मेरी आँख नम हो आयी...मैंने रात दिन कड़ी निगरानी राखी...जब तक उस बुलबुल ने अंडे देके बच्चे नही निकाले, मैंने इस पेड़ को बिल्लियों और कव्वों से महफूज़ रखा...!
इस परिंदे ने एक बार नही दो बार इसपे अपने घोंसले बनाये...! परिंदे तो उड़ गए, घोंसले यादगार की तौरपे मेरे पास हैं! इसी पेड़ पे रखे हुए नज़र आते हैं, गर गौरसे देखा जाय तो...! लेकिन उन घोंसलों की अलग से एक तस्वीर कभी ना कभी ज़रूर पोस्ट करूँगी...!

इस पोस्ट को नाम देने का दिल करता है सो ये," मेरे घर आना ज़िंदगी..!".....कई बार आना ज़िंदगी....मेरे अपने पँछी तो उड़ गए...दूर, दूर घोंसले बना लिए...लेकिन परिंदों, तुम आते रहना .....अपने घोंसले बनाते रहना...वादा रहा...इन्हें मेरे जीते जी, महफूज़ रखूँगी...!

Saturday, September 12, 2009

गिल्हेरी..१) ये वो नही!

इन यादों की शुरुआत होती है बचपनसे...slide में एक गिल्हेरी दिख है ना? पर ये वो नही...जिसका क़िस्सा बताने जा रही हूँ....

११/१२ साल की उम्र रही होगी मेरी..एक दिन एक गिल्हेरी का बच्चा मुझे और मेरी माँ को नीम के पेड़ के नीचे गिरा मिला...मादा थी..बेचारी तड़प रही थी...अन्य पँछी उसे चोंच मार रहे थे...हमने उसे उठा लिया...नरम कपडेमे लपेट मरहम लगाया...स्याही के dropper से दूध पिलाया...और तभी से उसका नाम सोनू पड़ गया...

या तो माँ की साडी में घुसी रहती या जब मै घरपे होती तो मेरे blouse या frock के collar में छुपी रहती...भूक लगती तो चिकुड देती...धीरे वो इधर उधर आँगन में घूमने लगी...लेकिन जब कभी," सोनूsssssss"...ये आवाज़ सुनती,जहाँ होती दौडी चली आती...ऐसेमे मै उसे कभी मूँगफली , कभी आटा तो कभी कुछ और, खिला देती...फलों की शौकीन तो ये जाती रहती ही है...जिनकी हमारे घरमे कमी नही थी..दादा ने सैंकडो पेड़ लगा रखे थे...

रात में सोने के लिए वो ज़रूर घरमे घुस आती...छोटा-सा मोधा था, उसके नीचे हम री और कपड़े के तुकडे डाल देते और ये उसके नीचे सो जाती।

गरमी का मौसम था। हमारे बिस्तर-बिछौने घरके बाहर लगे थे। लेकिन इसे उसी कालीन पे, मोढे के नीचे सोना होता।

हमारे यहाँ एक औरत काम करती। अक्सर बिछौने वही लगाती। सुबह बाहर से बिछौने उठा लाई और मोढा हटा के उसपे गद्दा पटक मारा...सोनू दम घुट के , दबके मर गयी...

मुझे याद है, मै बड़ा रोई थी...!

लेकिन slide में दिखने वाली गिलहरी और ही है...उसकी कहानी अगली बार...