Thursday, July 2, 2009

बुलबुल का घोंसला...!


इस बोनसाय के पेड़ के साथ बडीही मधुर यादगार जुडी हुई है....इस बात को शायद १० साल हो गए...एक दिन सुबह मै अपने इन "बच्चों" के पास आयी तो देखा, इस पेड़ पे बुलबुल घोंसला बना रही थी...!कितने विश्वास के साथ....! इस पँछी का ऐसा विश्वास देख, मेरी आँख नम हो आयी...मैंने रात दिन कड़ी निगरानी राखी...जब तक उस बुलबुल ने अंडे देके बच्चे नही निकाले, मैंने इस पेड़ को बिल्लियों और कव्वों से महफूज़ रखा...!
इस परिंदे ने एक बार नही दो बार इसपे अपने घोंसले बनाये...! परिंदे तो उड़ गए, घोंसले यादगार की तौरपे मेरे पास हैं! इसी पेड़ पे रखे हुए नज़र आते हैं, गर गौरसे देखा जाय तो...! लेकिन उन घोंसलों की अलग से एक तस्वीर कभी ना कभी ज़रूर पोस्ट करूँगी...!

इस पोस्ट को नाम देने का दिल करता है सो ये," मेरे घर आना ज़िंदगी..!".....कई बार आना ज़िंदगी....मेरे अपने पँछी तो उड़ गए...दूर, दूर घोंसले बना लिए...लेकिन परिंदों, तुम आते रहना .....अपने घोंसले बनाते रहना...वादा रहा...इन्हें मेरे जीते जी, महफूज़ रखूँगी...!

13 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

घोंसला नजर आ रहा है

और उन्‍हें सहेजने का

आपका जज्‍बा भी।


आपकी संवेदना को

हरा सलाम।

Science Bloggers Association said...

आपके इस जज्‍बे को सलाम करता हूं।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भावों की अभिव्यक्ति अनुपमेय है।
बधाई।

राजीव तनेजा said...

भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति

विवेक सिंह said...

बहुत सुन्दर !

Vijay Kumar Sappatti said...

shama ji , main bahut der se aapke dusare saare blogs dhoondh raha hoon , nahi dikh rahe hai .. kya hua , sab delete ho gaye kya .. ya koi aur naam se blog ya website hai ? mujhe italla kijiye ..

itni sundar aur manbhaavan post ke liye badhai ....

ललितमोहन त्रिवेदी said...

शमा जी ,एक मित्र की बीमारी के कारण व्यस्तता रही जिसके कारण ब्लॉग पर देर से आ सका क्षमा चाहूंगा !आपकी सभी रचनाएँ मैं बहुत मनोयोग से पढ़ता हूँ !आज आपकी कहानी " कुछ कदम दूर "फिर से पढ़ी ,सच कहता हूँ शमा जी आपकी इस कहानी की जितनी भी तारीफ की जाय कम है !आँखें डबडबा आती है इसे पढ़ते पढ़ते ,एक नहीं कई बार ! निर्मला की विवशता को ,.....उसकी आरजू ही कितनी सी थी ?थोडा सा प्यार .........और ........ तिल तिल जली होगी अन्दर ही अन्दर !कैसा किसी उजियारे का इंतजार उसकी आँखों को रहा होगा ......., कितनी सहजता से बयां कर गयी है आप !
दूसरी ओरअपनी अस्मिता को पहचानती और आत्मविश्वाश से लबरेज़ अनुपमा नारी की सतर होती रीढ़ का प्रतिनिधित्व करती है .......दादी माँ,ताई जी,आज मैं बोलूंगी और आप सुनेंगे ............! " .....चलो माँ चलो और हाँ इस मंगलसूत्र को उतरकर यहीं रखो !यह चीज न तो आपके लिए मंगल रही है और अब यह सूत्र भी नहीं रहा ........! बहुत ही खूबसूरत शब्दों में व्यक्त किया है आपने नारी की इस ओजस्विता को ! निश्चय ही आप इस रचना के लिए बधाई की पात्र हैं ,मुझे शब्द कम पड़ रहे है इसकी समीक्षा के लिए ,इसके लिए तो एक अलग से लेख की दरकार है !

vinay said...

kuch ghtnay aisi hoti hai,jo jeevan main yaad chod jati hai,aur unki punaavriti ki iccha hoti hai.

संजीव गौतम said...

आपकी संवेदनाओं को सलाम...........

Murari Pareek said...

बहुत संवेदनशील हैं आप आपकी भावनाओ को मेरा प्रणाम!!

woyaadein said...

छोटी-छोटी लेकिन महत्त्वपूर्ण,संवेदनशील यादें.....ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी हुआ.....अभी जिस कमरे में पहले रहता था...वहां पर एक कबूतरी ने दो नन्हे-मुन्ने और प्यारे बच्चों को जन्म दिया.....हमारा प्रयास भी कुछ आपकी ही तरह रहा....इस बारे में कभी विस्तार से लिखूंगा......अच्छा संस्मरण....

साभार
प्रशान्त कुमार (काव्यांश)
हमसफ़र यादों का.......

दिगम्बर नासवा said...

आपका मान संवेदन शील है.......... यादों को सॅंजो कर रखना चाहता है....... सुंदर पोस्ट है .

प्रशांत गुप्ता said...

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है