> "अम्मा, आज बेहद थक गयी हूँ...फिरभी रायभान के बारेमे लिखनेका मोह टाल नही पा रही हूँ...
हाँ, वही क़िस्सा बयाँ करनेके खातिर आज लिखना शुरू किया....
पता नही क्यों,रायभान को बस्ती परके सारे बच्चे, हिक़ारत से देखते थे...उसके साथ बुरी तरहसे पेश आते थे...जैसे कि,वो बतख की कहानी...उन बतखों मे एक हँस था..जिसे सब कुरूप कहते थे....रायभान की माँ, हमारे घरमे काम करती थी....
"सब बच्चे हमारी घरकी सीढियों पे बैठ, कुछ खेल रहे थे...मै बगीचे से आयी और सीढीयाँ लाघते हुए, रायभानको एक लात मार दी...बेचारेने," अरे, हटता हूँ, हटता हूँ," कहा और हट गया...
अम्मा, आप सब देख रहीँ थीं...आपने अन्य बच्चों को एक तरफ़ बिठा दिया ...मुझे और रायभानको अपने सामने बुलाया...
"मुझसे बोलीं," इसके सामने कान पकडके १० बार उठक बैठक करो, और हर बार माफी माँगो...कहो,कि, ऐसी हरकत फिरसे कभी नही करोगी..!"
"बेचारा रायभान बडाही सकुचाया-सा एक कोनेमे खड़ा हो गया...
"आपके आगे मना करनेका तो सवालही नही था..जैसा आपने कहा वैसाही मैंने किया......
उसके बाद आपने सब बच्चों को अपने,अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास,प्यारसे लेके बैठीं और कहा," देखो बेटा, खुदाके आगे सब बच्चे एक जैसे होते हैं...और तुम्हें उसे लात मारके ख़ुशी मिली? तुमने हरकोई उसके साथ ऐसीही चाल चलता है ये देखा और वैसाही किया...हैना? '
"अम्मा, ये शत प्रतिशत सच था...मै खामोश बैठी रही...मेरी उम्र थी कुछ ३ सालकी...लेकिन मैंने ग़लत बात की है, ये मै खूब समझ गयी...
"उस रात मेरे गलेसे खाना उतरा नही..दादा पूछते रहे,कि, मै क्यों खाना नही खा रही...
आपने कहा," कोई बात नही गर एक रात नही खायेगी तो...उसने शामको दूध तो लेही लिया है...फलभी खाया है...नही खा पा रही,तो उसे सो जाने देते हैं।'
"दूसरे दिन सुबह हुई,तो मैंने अपनी माँ और पिताको घरसे नदारत पाया....दादी को पुकारने लगी...वो आ गयीं....
मैंने उनसे पूछा," अम्मा और बाबा कहाँ गए हैं? और वनुमासी,(रायभान की माँ,) क्यों नही आयी? आप क्यों नाश्ता बना रहीं हैं?"
दादीअम्मा ने कहा," तुम्हारे अम्मा -बाबा किसी वजहसे अस्पताल गए हैं...!"
बाबा तो कुछ देर बाद लौट आए...आप नही लौटी....
शाम हुई तो मैंने ज़िद की," दादी अम्मा मुझे बस्ती परके बच्चों के साथ खेलना है...उन्हें बुलाओ ना...और रायभान से मुझे,'डम डम डिगा,डिगा ये गाना भी सुनना है..."
दादी अम्माने मुझे समझाते हुए कहा, " आज नही...अभी कल देखेंगे....! चलो आज मैही तुम्हें कहानी भी सुना दूँगी, और खाना भी खिला दूँगी.."
"अम्मा आप देर रात किसी वक़्त आयीं ...मुझे ठीकसे पता नही चला, लेकिन आपको मेरी बग़ल मे पाके बड़ा सुरक्षित लगा..
"सुबह मेरी आँखें खुली, तो फिर आप मेरे पास नही थीं ...मुझे बस्ती परसे रोने धोनेकी आवाजें आ रहीं थीं...मै कुछ समझ नही सकी...जानती थी,कि, बस्तीपरके कई मर्द अपनी बीबिओं को मारते हैं..ऐसेमे वो रोती,रोती माँ या दादी के पास आती थीं..अब जब माँ ख़ुद बस्तीपे मौजूद है,ये मुझे बताया गया, तो मुझे बेहद हैरानी हुई,...माँ के होते हुए भी क्या उन औरतोंको मारा जा रहा है?
मैंने दादी अम्मासे कहा," मुझे बस्तीपे जाना है...मुझे जाने दो ना.....!"
"दादीअम्मा ने मुझे अपनी गोदीमे लेके कहा," अभी नही...शामको देखेंगे......"
"लेकिन आप कलसे मुझे रोक रहीं हैं..मुझे वो गाना सुनना है रायभान से...उसे तो बुला लो ना..!"मैंने अपनी ज़िद कायम रखी......
"अंतमे दादी अम्मा ने शायद सोचा कि, मुझे चंद बातें औरोसे पता चलें, उस बनिस्बत, वो खुद्ही बता दें तो बेहतर होगा......
"वो कहने लगीं,तो मैंने गौरसे उनके चेहरेकी ओर देखा...उनकी आँखों मे पानी था..होंठ काँप रहे थे,....... उन्हों ने कहना शुरू किया," बच्चे, रायभान अब फिरसे यहाँ कभी नही आयेगा.......!"
"लेकिन क्यों? मैंने उसे लात मारी थी इसलिए? मैंने माफी तो माँगी थी..दादी अम्मा आप उससे कहो ना,कि, मै फिरसे ऐसा नही करूँगी.." मुझे अब रुलाई-सी आने लगी थी...
"दादी अम्माके आँखों से अब पानी बहने लगा था...वो बोलीं," रायभान अब भगवान् जी के पास चला गया है! वो दोबारा हमें कभी नही दिखेगा....!"
मेरा मन एकदमसे धक्-सा रह गया..मै इतना जानती थी,कि, एकबार जब कोई "भगवान्" या "खुदाके" पास जाता है तो फिर कभी नही लौटता...! मुझे यक़ीन हो गया कि,वो मुझीसे रूठके चला गया....मेरे बाल मनपे जो उस समय गुज़री, उसका बयान करना कठिन है.....
"बादमे पता चलता रहा...वनुबाई ने चुल्हेपे बड़े-से पतीलेमे, नहानेके लिए पानी गरम करने चढाया था...रायभान और उसकी छोटी बेहेन छबी, वहीँ पे शायद कुछ उधम मचा रहे थे...वो खौलता पानी, चुल्हेपरसे उलट गया और दोनों बच्चों पे जा गिरा...छबू तो बच गयी...रायभान ईश्वर को प्यारा हो गया....
"मुझे याद है, मै, बोहोद दिनों तक सदमेमे चली गयी थी..खानेके लिए जैसे मुझे बिठाया जाता था, मुझे उबकाई आ जाती थी..मुझे अन्य एक बच्चे ने बताया था,कि, रायभान को भूक लगी थी, इसलिए वो अपनी माँ के पास पोहोंचा था..रोटी माँगते हुए...मुझे अब तो याद नही,कि, मै कितने दिन खाना नही खा पायी....
"अम्मा, अगर आप उस शाम मुझसे माफी ना मँगवाती,तो ताउम्र मै पश्च्यातापकी अग्नीमे जलती रहती...कभी खुदको माफ़ करही नही पाती...आजभी वो सारी बातें मेरे मनमे ऐसे अंकित हैं, जैसे कल परसों घटी हों....
सोचती हूँ, मैंने ऐसी हरकत कीही कैसे? क्या सवार था मुझपे? सिर्फ़ किसी अन्य की देखा देखी कर दी? लेकिन,जब कभी मुझे ये बात याद आती है तो शर्मसार हो जाती हूँ...जब कभी, डम डम डिगा, डिगा ये गीत बजता है,तो रायभान का भोला-सा चेरा सामने आ जाता है..."
क्रमश:
Showing posts with label प्यारी माँ. Show all posts
Showing posts with label प्यारी माँ. Show all posts
Tuesday, December 22, 2009
Monday, June 1, 2009
माँ, प्यारी माँ...!३
"अम्मा, आज बेहद थक गयी हूँ...फिरभी रायभान के बारेमे लिखनेका मोह टाल नही पा रही हूँ...
हाँ, वही क़िस्सा बयाँ करनेके खातिर आज लिखना शुरू किया....
पता नही क्यों,रायभान को बस्ती परके सारे बच्चे, हिक़ारत से देखते थे...उसके साथ बुरी तरहसे पेश आते थे...जैसे कि,वो बतख की कहानी...उन बतखों मे एक हँस था..जिसे सब कुरूप कहते थे....रायभान की माँ, हमारे घरमे काम करती थी....
"सब बच्चे हमारी घरकी सीढियों पे बैठ, कुछ खेल रहे थे...मै बगीचे से आयी और सीढीयाँ लाघते हुए, रायभानको एक लात मार दी...बेचारेने," अरे, हटता हूँ, हटता हूँ," कहा और हट गया...
अम्मा, आप सब देख रहीँ थीं...आपने अन्य बच्चों को एक तरफ़ बिठा दिया ...मुझे और रायभानको अपने सामने बुलाया...
"मुझसे बोलीं," इसके सामने कान पकडके १० बार उठक बैठक करो, और हर बार माफी माँगो...कहो,कि, ऐसी हरकत फिरसे कभी नही करोगी..!"
"बेचारा रायभान बडाही सकुचाया-सा एक कोनेमे खड़ा हो गया...
"आपके आगे मना करनेका तो सवालही नही था..जैसा आपने कहा वैसाही मैंने किया......
उसके बाद आपने सब बच्चों को अपने,अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास,प्यारसे लेके बैठीं और कहा," देखो बेटा, खुदाके आगे सब बच्चे एक जैसे होते हैं...और तुम्हें उसे लात मारके ख़ुशी मिली? तुमने हरकोई उसके साथ ऐसीही चाल चलता है ये देखा और वैसाही किया...हैना? '
"अम्मा, ये शत प्रतिशत सच था...मै खामोश बैठी रही...मेरी उम्र थी कुछ ३ सालकी...लेकिन मैंने ग़लत बात की है, ये मै खूब समझ गयी...
"उस रात मेरे गलेसे खाना उतरा नही..दादा पूछते रहे,कि, मै क्यों खाना नही खा रही...
आपने कहा," कोई बात नही गर एक रात नही खायेगी तो...उसने शामको दूध तो लेही लिया है...फलभी खाया है...नही खा पा रही,तो उसे सो जाने देते हैं।'
"दूसरे दिन सुबह हुई,तो मैंने अपनी माँ और पिताको घरसे नदारत पाया....दादी को पुकारने लगी...वो आ गयीं....
मैंने उनसे पूछा," अम्मा और बाबा कहाँ गए हैं? और वनुमासी,(रायभान की माँ,) क्यों नही आयी? आप क्यों नाश्ता बना रहीं हैं?"
दादीअम्मा ने कहा," तुम्हारे अम्मा -बाबा किसी वजहसे अस्पताल गए हैं...!"
बाबा तो कुछ देर बाद लौट आए...आप नही लौटी....
शाम हुई तो मैंने ज़िद की," दादी अम्मा मुझे बस्ती परके बच्चों के साथ खेलना है...उन्हें बुलाओ ना...और रायभान से मुझे,'डम डम डिगा,डिगा ये गाना भी सुनना है..."
दादी अम्माने मुझे समझाते हुए कहा, " आज नही...अभी कल देखेंगे....! चलो आज मैही तुम्हें कहानी भी सुना दूँगी, और खाना भी खिला दूँगी.."
"अम्मा आप देर रात किसी वक़्त आयीं ...मुझे ठीकसे पता नही चला, लेकिन आपको मेरी बग़ल मे पाके बड़ा सुरक्षित लगा..
"सुबह मेरी आँखें खुली, तो फिर आप मेरे पास नही थीं ...मुझे बस्ती परसे रोने धोनेकी आवाजें आ रहीं थीं...मै कुछ समझ नही सकी...जानती थी,कि, बस्तीपरके कई मर्द अपनी बीबिओं को मारते हैं..ऐसेमे वो रोती,रोती माँ या दादी के पास आती थीं..अब जब माँ ख़ुद बस्तीपे मौजूद है,ये मुझे बताया गया, तो मुझे बेहद हैरानी हुई,...माँ के होते हुए भी क्या उन औरतोंको मारा जा रहा है?
मैंने दादी अम्मासे कहा," मुझे बस्तीपे जाना है...मुझे जाने दो ना.....!"
"दादीअम्मा ने मुझे अपनी गोदीमे लेके कहा," अभी नही...शामको देखेंगे......"
"लेकिन आप कलसे मुझे रोक रहीं हैं..मुझे वो गाना सुनना है रायभान से...उसे तो बुला लो ना..!"मैंने अपनी ज़िद कायम रखी......
"अंतमे दादी अम्मा ने शायद सोचा कि, मुझे चंद बातें औरोसे पता चलें, उस बनिस्बत, वो खुद्ही बता दें तो बेहतर होगा......
"वो कहने लगीं,तो मैंने गौरसे उनके चेहरेकी ओर देखा...उनकी आँखों मे पानी था..होंठ काँप रहे थे,....... उन्हों ने कहना शुरू किया," बच्चे, रायभान अब फिरसे यहाँ कभी नही आयेगा.......!"
"लेकिन क्यों? मैंने उसे लात मारी थी इसलिए? मैंने माफी तो माँगी थी..दादी अम्मा आप उससे कहो ना,कि, मै फिरसे ऐसा नही करूँगी.." मुझे अब रुलाई-सी आने लगी थी...
"दादी अम्माके आँखों से अब पानी बहने लगा था...वो बोलीं," रायभान अब भगवान् जी के पास चला गया है! वो दोबारा हमें कभी नही दिखेगा....!"
मेरा मन एकदमसे धक्-सा रह गया..मै इतना जानती थी,कि, एकबार जब कोई "भगवान्" या "खुदाके" पास जाता है तो फिर कभी नही लौटता...! मुझे यक़ीन हो गया कि,वो मुझीसे रूठके चला गया....मेरे बाल मनपे जो उस समय गुज़री, उसका बयान करना कठिन है.....
"बादमे पता चलता रहा...वनुबाई ने चुल्हेपे बड़े-से पतीलेमे, नहानेके लिए पानी गरम करने चढाया था...रायभान और उसकी छोटी बेहेन छबी, वहीँ पे शायद कुछ उधम मचा रहे थे...वो खौलता पानी, चुल्हेपरसे उलट गया और दोनों बच्चों पे जा गिरा...छबू तो बच गयी...रायभान ईश्वर को प्यारा हो गया....
"मुझे याद है, मै, बोहोद दिनों तक सदमेमे चली गयी थी..खानेके लिए जैसे मुझे बिठाया जाता था, मुझे उबकाई आ जाती थी..मुझे अन्य एक बच्चे ने बताया था,कि, रायभान को भूक लगी थी, इसलिए वो अपनी माँ के पास पोहोंचा था..रोटी माँगते हुए...मुझे अब तो याद नही,कि, मै कितने दिन खाना नही खा पायी....
"अम्मा, अगर आप उस शाम मुझसे माफी ना मँगवाती,तो ताउम्र मै पश्च्यातापकी अग्नीमे जलती रहती...कभी खुदको माफ़ करही नही पाती...आजभी वो सारी बातें मेरे मनमे ऐसे अंकित हैं, जैसे कल परसों घटी हों....
सोचती हूँ, मैंने ऐसी हरकत कीही कैसे? क्या सवार था मुझपे? सिर्फ़ किसी अन्य की देखा देखी कर दी? लेकिन,जब कभी मुझे ये बात याद आती है तो शर्मसार हो जाती हूँ...जब कभी, डम डम डिगा, डिगा ये गीत बजता है,तो रायभान का भोला-सा चेरा सामने आ जाता है..."
क्रमश:
वर्तनी के लिए माफी चाहती हूँ..कोशिश तो की है, फिरभी गर कुछ typos रह गए हों,तो क्षमाप्रार्थी हूँ!
प्रस्तुतकर्ता shama पर 11:39 AM संदेश का संपादन करें">
लेबल: पश्च्याताप, प्यारी माँ, माँ, माफी., शमा, संस्मरण, हिन्दी
हाँ, वही क़िस्सा बयाँ करनेके खातिर आज लिखना शुरू किया....
पता नही क्यों,रायभान को बस्ती परके सारे बच्चे, हिक़ारत से देखते थे...उसके साथ बुरी तरहसे पेश आते थे...जैसे कि,वो बतख की कहानी...उन बतखों मे एक हँस था..जिसे सब कुरूप कहते थे....रायभान की माँ, हमारे घरमे काम करती थी....
"सब बच्चे हमारी घरकी सीढियों पे बैठ, कुछ खेल रहे थे...मै बगीचे से आयी और सीढीयाँ लाघते हुए, रायभानको एक लात मार दी...बेचारेने," अरे, हटता हूँ, हटता हूँ," कहा और हट गया...
अम्मा, आप सब देख रहीँ थीं...आपने अन्य बच्चों को एक तरफ़ बिठा दिया ...मुझे और रायभानको अपने सामने बुलाया...
"मुझसे बोलीं," इसके सामने कान पकडके १० बार उठक बैठक करो, और हर बार माफी माँगो...कहो,कि, ऐसी हरकत फिरसे कभी नही करोगी..!"
"बेचारा रायभान बडाही सकुचाया-सा एक कोनेमे खड़ा हो गया...
"आपके आगे मना करनेका तो सवालही नही था..जैसा आपने कहा वैसाही मैंने किया......
उसके बाद आपने सब बच्चों को अपने,अपने घर भेज दिया...
मुझे अपने पास,प्यारसे लेके बैठीं और कहा," देखो बेटा, खुदाके आगे सब बच्चे एक जैसे होते हैं...और तुम्हें उसे लात मारके ख़ुशी मिली? तुमने हरकोई उसके साथ ऐसीही चाल चलता है ये देखा और वैसाही किया...हैना? '
"अम्मा, ये शत प्रतिशत सच था...मै खामोश बैठी रही...मेरी उम्र थी कुछ ३ सालकी...लेकिन मैंने ग़लत बात की है, ये मै खूब समझ गयी...
"उस रात मेरे गलेसे खाना उतरा नही..दादा पूछते रहे,कि, मै क्यों खाना नही खा रही...
आपने कहा," कोई बात नही गर एक रात नही खायेगी तो...उसने शामको दूध तो लेही लिया है...फलभी खाया है...नही खा पा रही,तो उसे सो जाने देते हैं।'
"दूसरे दिन सुबह हुई,तो मैंने अपनी माँ और पिताको घरसे नदारत पाया....दादी को पुकारने लगी...वो आ गयीं....
मैंने उनसे पूछा," अम्मा और बाबा कहाँ गए हैं? और वनुमासी,(रायभान की माँ,) क्यों नही आयी? आप क्यों नाश्ता बना रहीं हैं?"
दादीअम्मा ने कहा," तुम्हारे अम्मा -बाबा किसी वजहसे अस्पताल गए हैं...!"
बाबा तो कुछ देर बाद लौट आए...आप नही लौटी....
शाम हुई तो मैंने ज़िद की," दादी अम्मा मुझे बस्ती परके बच्चों के साथ खेलना है...उन्हें बुलाओ ना...और रायभान से मुझे,'डम डम डिगा,डिगा ये गाना भी सुनना है..."
दादी अम्माने मुझे समझाते हुए कहा, " आज नही...अभी कल देखेंगे....! चलो आज मैही तुम्हें कहानी भी सुना दूँगी, और खाना भी खिला दूँगी.."
"अम्मा आप देर रात किसी वक़्त आयीं ...मुझे ठीकसे पता नही चला, लेकिन आपको मेरी बग़ल मे पाके बड़ा सुरक्षित लगा..
"सुबह मेरी आँखें खुली, तो फिर आप मेरे पास नही थीं ...मुझे बस्ती परसे रोने धोनेकी आवाजें आ रहीं थीं...मै कुछ समझ नही सकी...जानती थी,कि, बस्तीपरके कई मर्द अपनी बीबिओं को मारते हैं..ऐसेमे वो रोती,रोती माँ या दादी के पास आती थीं..अब जब माँ ख़ुद बस्तीपे मौजूद है,ये मुझे बताया गया, तो मुझे बेहद हैरानी हुई,...माँ के होते हुए भी क्या उन औरतोंको मारा जा रहा है?
मैंने दादी अम्मासे कहा," मुझे बस्तीपे जाना है...मुझे जाने दो ना.....!"
"दादीअम्मा ने मुझे अपनी गोदीमे लेके कहा," अभी नही...शामको देखेंगे......"
"लेकिन आप कलसे मुझे रोक रहीं हैं..मुझे वो गाना सुनना है रायभान से...उसे तो बुला लो ना..!"मैंने अपनी ज़िद कायम रखी......
"अंतमे दादी अम्मा ने शायद सोचा कि, मुझे चंद बातें औरोसे पता चलें, उस बनिस्बत, वो खुद्ही बता दें तो बेहतर होगा......
"वो कहने लगीं,तो मैंने गौरसे उनके चेहरेकी ओर देखा...उनकी आँखों मे पानी था..होंठ काँप रहे थे,....... उन्हों ने कहना शुरू किया," बच्चे, रायभान अब फिरसे यहाँ कभी नही आयेगा.......!"
"लेकिन क्यों? मैंने उसे लात मारी थी इसलिए? मैंने माफी तो माँगी थी..दादी अम्मा आप उससे कहो ना,कि, मै फिरसे ऐसा नही करूँगी.." मुझे अब रुलाई-सी आने लगी थी...
"दादी अम्माके आँखों से अब पानी बहने लगा था...वो बोलीं," रायभान अब भगवान् जी के पास चला गया है! वो दोबारा हमें कभी नही दिखेगा....!"
मेरा मन एकदमसे धक्-सा रह गया..मै इतना जानती थी,कि, एकबार जब कोई "भगवान्" या "खुदाके" पास जाता है तो फिर कभी नही लौटता...! मुझे यक़ीन हो गया कि,वो मुझीसे रूठके चला गया....मेरे बाल मनपे जो उस समय गुज़री, उसका बयान करना कठिन है.....
"बादमे पता चलता रहा...वनुबाई ने चुल्हेपे बड़े-से पतीलेमे, नहानेके लिए पानी गरम करने चढाया था...रायभान और उसकी छोटी बेहेन छबी, वहीँ पे शायद कुछ उधम मचा रहे थे...वो खौलता पानी, चुल्हेपरसे उलट गया और दोनों बच्चों पे जा गिरा...छबू तो बच गयी...रायभान ईश्वर को प्यारा हो गया....
"मुझे याद है, मै, बोहोद दिनों तक सदमेमे चली गयी थी..खानेके लिए जैसे मुझे बिठाया जाता था, मुझे उबकाई आ जाती थी..मुझे अन्य एक बच्चे ने बताया था,कि, रायभान को भूक लगी थी, इसलिए वो अपनी माँ के पास पोहोंचा था..रोटी माँगते हुए...मुझे अब तो याद नही,कि, मै कितने दिन खाना नही खा पायी....
"अम्मा, अगर आप उस शाम मुझसे माफी ना मँगवाती,तो ताउम्र मै पश्च्यातापकी अग्नीमे जलती रहती...कभी खुदको माफ़ करही नही पाती...आजभी वो सारी बातें मेरे मनमे ऐसे अंकित हैं, जैसे कल परसों घटी हों....
सोचती हूँ, मैंने ऐसी हरकत कीही कैसे? क्या सवार था मुझपे? सिर्फ़ किसी अन्य की देखा देखी कर दी? लेकिन,जब कभी मुझे ये बात याद आती है तो शर्मसार हो जाती हूँ...जब कभी, डम डम डिगा, डिगा ये गीत बजता है,तो रायभान का भोला-सा चेरा सामने आ जाता है..."
क्रमश:
वर्तनी के लिए माफी चाहती हूँ..कोशिश तो की है, फिरभी गर कुछ typos रह गए हों,तो क्षमाप्रार्थी हूँ!
प्रस्तुतकर्ता shama पर 11:39 AM संदेश का संपादन करें">
लेबल: पश्च्याताप, प्यारी माँ, माँ, माफी., शमा, संस्मरण, हिन्दी
Labels:
पश्च्याताप,
प्यारी माँ,
माँ,
माफी.,
शमा,
संस्मरण,
हिन्दी
माँ, प्यारी माँ ! २
आजसे अपनी माँ के साथ, सीधा संभाषण ही करूँगी...जैसे अपनी बेटीसे करती रही हूँ...मूक...वो सुने ना सुने...चाहती हूँ, कि, ये आलेख मेरी माँ ज़रूर पढ़ें...ईश्वर, ये मौक़ा मुझे ज़रूर देना...ये सँवाद अनसुना ना रह जाय...
"अम्मा...आपकी आजकल, पहले शायद कभी नही आती थी, इतनी याद आने लगी है...
आपकी नवासी का एक छोटा-सा किस्सा सुनाती हूँ आपको..शायद पहले ज़रूर सुनाया होगा, पर फिर एकबार...
कुछ ४ साल की आयु थी उसकी...किसी बातपे मुझसे नाराज़ हुई, और अपना पलंग ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगी...
मैंने कहा," बेटा, जानती हो ये कितना पुराना पलंग है? जब तुम्हारे नाना छोटे थे, तो वो इसमे सोते थे....उसके बाद जब मै छोटी थी, तो मुझे इसमे सुलाया जाता था...बादमे तुम्हारी,मासी, मामा, सब इसीमे सोते रहे...आज वो तुम्हें मिला है..."
जैसे, जैसे मै उसे बता रही थी, वो स्तब्ध होती जा रही थी...आँखें फटी जा रही थीं....! पलंग हिलाना भी बंद हो गया...!
मुझसे बोली," माँ! जब तुम छोटी थीं, तो हम दोनों की देखभाल कौन करता था?"
मै जोरसे हँस पडी,बोली," जब मै छोटी थी,तो तुम दोनों इस दुनियामे नही थे!"
उसकी आँखें औरभी गोल, गोल हो गयीं...बोली," तो फिर हम कहाँ थे?"
"तुम भगवानजी के पास थे,"मेरा उत्तर ....
बेटी: "तो फिर हमें वहाँसे यहाँ कौन लाया?"
मै: " तुम दोनों हमें बोहोत पसंद आ गए...इसलिए तुम्हें हम भगवानजी से माँग के इस दुनियामे ले आए.."
कैसा निष्पाप, भोला बचपन था उसका....
अम्मा ! जब मै छोटी थी, तो मुझेभी ऐसाही लगता था...अपनी माँ हमेशा बड़ी ही रही होगी...याद है आपको मै आपसे कैसे,कैसे सवाल किया करती थी?
मेरी कँघी कर रहीँ थीं आप..मुझे इतना याद है, कि, मेरी छोटी बेहेन का जन्म तब नही हुआ था...मैंने पता नही क्या बात कही, और आप जोरसे हँस पड़ीं..
मैंने आपसे, बड़े अचरज से पूछा," अम्मा, जब आपकी माँ आपके पास नही हैं, तो आप हँस कैसे सकती हैं? आपको रोना नही आता?"
आप फिर एकबार हँस पड़ीं, बोलीं:"एक दिन तूभी मुझसे दूर होगी और फिरभी तू हँस पायेगी...खुदा करे, ऐसा हो....!"
मै खामोश हो गयी...ऐसाभी कभी हो सकता है? माँ साथ न हो? घरमे रिकॉर्ड प्लेएर पे एक गीत हमेशा सुना करती थी मै...शमशाद बेगम का गाया हुआ...."छोड़ बाबुल का घर, मोहे पीके नगर, आज जाना पडा,आज जाना पडा, याद करके ये घर, रोयीं आँखें मगर ,मुस्कुराना पडा, आज जाना पडा.."
याद है,मैंने आपसे पूछा था," अम्मा ! 'बाबुल" का " घर क्या होता है?"
अम्मा: ""बाबुल"का घर मतलब अपनी माँ घर, अपने पिता का घर..."
मै:" और 'पीका' घर मतलब?"
अम्मा:" पीका" घर मतलब, जैसे,ये घर मेरे लिए है...ये घर मेरी माँ का घर नही..मै शादी करके,फिर यहाँ रहने आयी....ये मेरे 'पतीका" मतलब 'पीका" घर है....तेरे 'बाबा' मेरे 'पी' हैं..!"
मै:" क्यों? आपको अपना घर क्यों छोड़ना पडा? नानीअम्मा को बुरा नही लगा आपको यहाँ भेज देना? और वो गानेवाली को क्यों जाना पडा? उसके साथ किसीने ज़बरदस्ती की? उसको रोना भी आया फिरभी उसको क्यों जाना पडा?"
मुझे याद है, आप बोलीं थीं:"एक दिन तुझेभी जाना पडेगा..इसी तरह...और शायद तू खुशीसे जायेगी...हो सकता है, जाते समय रो दे......"
मैंने वो ख़याल अपने मनसे पूरी तरह झाड़ दिया...ऐसा होही नही सकता...मै अपनी माँ, दादा, दादी और इस घर को छोड़ के कहीँ भी नही जा सकती...बल्कि, नही ही जाऊँगी...!
लेकिन, चलीही गयी...हाँ, रोई तो बोहोत...घरको तो भूल पाना ....वो तो खैर , नामुमकिन है...!..उस घरमे कितनेही बदलाव हो गए, लेकिन मुझे, वो घर वैसाही दिखता है, अपने सपनों में, जैसा तब था..जब आपका और मेरा ये सम्भाषण हुआ था...
इतने बरसों बादभी,मुझे "अपने घरके" तौरपे वही घर दिखता है! मुझे अपने ससुराल वालेभी गर सपनेमे दिखते हैं, तो उसी घरमे....! मुझे आजतक कोई अन्य घर दिखाही नही!
और ये बात आपकी छोटी बेटीके साथभी होती है...इतनाही नही..हमें किहीम भी और वहाँ का समंदर भी ( मेरे परदादाका एक घर किहीम, इस गाँव के, समंदरके किनारे, था....मुम्बईके पास), अपने खेतको लगी ज़मीनपे दिखता है...और सिर्फ़ मुझे और कुन्नुको नहीँ...आपके बेटेको भी किहीम का समंदर वहीँ नज़र आता है,अपने सपनोंमे... !!!उसे अपना घर छोड़, अन्य घर जाना नही पडा, तो उसे बचपनका घर सपनेमे दिखना लाज़िम है..लेकिन हम दोनों लड़कियोंको???
पता है आपको अम्मा...जब दादा के गुज़र जानेके बाद, दादीअम्मा कुछ रोज़ मेरे पास आके रहीँ,तो हमारी ये सपनों में घर दिखने वाली बात निकली...हैरान रह वो बोलीं," मुझे मेरा मायका छोडे ७२ सालसे अधिक हो गए...लेकिन, सपनेमे मुझे वही खम्बात का घर दिखता है..!"
सोचो तो ज़रा...दादाके साथ उनकी ज़िंदगी कितनी खुश गँवार गुज़री...! जिस दिन दादा गुज़र गए, वो उन दोनोकी शादीकी ७२ वी सालगिरह थी...! जिस दिन साथ जुड़े , उसी दिन बिछडे...!
लड़कियाँ क्यों "पराया धन" कहलातीं हैं? उनकी जड़ें कितनी अधिक उस भूमी, उस घरसे जुडी होती हैं, जहाँ, उनका बचपन गुजरता है...जहाँ उन्हें अपने यौवन मे पनाह मिली होती है..!!!जहाँ उन्हें सुरक्षित महसूस कराया जाता है...या जाना चाहिए...
वो एक शाम मुझे आजतलक नहीँ भूली...मै अपने दादा-दादीके साथ खेतपे घूमने गयी थी...वहाँसे लौटी तो आप रसोईकी सीढीपे खड़ी मिली..मै आपके क़रीब गयी,तो आपने मेरा माथा चूमा....उस एक प्यारे चुम्बनने मुझे कितना सुरक्षित महसूस कराया...मै इतने बरसों बादभी नही भूली...!
और एक बात के लिए मै आपकी ताउम्र शुक्र गुज़ार रहूँगी....ना जाने उस वक़्त आप मुझसे वैसा नही करवाती ,तो, मै ज़िंदगीभर कितना अधिक पछताती...३ सालकी उम्र होगी मेरी...फिरभी वो वाक़या मेरे ज़हन मे अंकित होके रह गया...नाभी रेहता, गर उसके अगले दिन जो घटा ,वो, ना घटा होता...आजभी सिहर जाती हूँ..आजभी अपनी प्यारी माँ के आगे नतमस्तक हो जाती हूँ...
आपके सदाही रुण मे रहना चाहती हूँ...चाहूँगी..."
क्रमश:
"अम्मा...आपकी आजकल, पहले शायद कभी नही आती थी, इतनी याद आने लगी है...
आपकी नवासी का एक छोटा-सा किस्सा सुनाती हूँ आपको..शायद पहले ज़रूर सुनाया होगा, पर फिर एकबार...
कुछ ४ साल की आयु थी उसकी...किसी बातपे मुझसे नाराज़ हुई, और अपना पलंग ज़ोर ज़ोर से हिलाने लगी...
मैंने कहा," बेटा, जानती हो ये कितना पुराना पलंग है? जब तुम्हारे नाना छोटे थे, तो वो इसमे सोते थे....उसके बाद जब मै छोटी थी, तो मुझे इसमे सुलाया जाता था...बादमे तुम्हारी,मासी, मामा, सब इसीमे सोते रहे...आज वो तुम्हें मिला है..."
जैसे, जैसे मै उसे बता रही थी, वो स्तब्ध होती जा रही थी...आँखें फटी जा रही थीं....! पलंग हिलाना भी बंद हो गया...!
मुझसे बोली," माँ! जब तुम छोटी थीं, तो हम दोनों की देखभाल कौन करता था?"
मै जोरसे हँस पडी,बोली," जब मै छोटी थी,तो तुम दोनों इस दुनियामे नही थे!"
उसकी आँखें औरभी गोल, गोल हो गयीं...बोली," तो फिर हम कहाँ थे?"
"तुम भगवानजी के पास थे,"मेरा उत्तर ....
बेटी: "तो फिर हमें वहाँसे यहाँ कौन लाया?"
मै: " तुम दोनों हमें बोहोत पसंद आ गए...इसलिए तुम्हें हम भगवानजी से माँग के इस दुनियामे ले आए.."
कैसा निष्पाप, भोला बचपन था उसका....
अम्मा ! जब मै छोटी थी, तो मुझेभी ऐसाही लगता था...अपनी माँ हमेशा बड़ी ही रही होगी...याद है आपको मै आपसे कैसे,कैसे सवाल किया करती थी?
मेरी कँघी कर रहीँ थीं आप..मुझे इतना याद है, कि, मेरी छोटी बेहेन का जन्म तब नही हुआ था...मैंने पता नही क्या बात कही, और आप जोरसे हँस पड़ीं..
मैंने आपसे, बड़े अचरज से पूछा," अम्मा, जब आपकी माँ आपके पास नही हैं, तो आप हँस कैसे सकती हैं? आपको रोना नही आता?"
आप फिर एकबार हँस पड़ीं, बोलीं:"एक दिन तूभी मुझसे दूर होगी और फिरभी तू हँस पायेगी...खुदा करे, ऐसा हो....!"
मै खामोश हो गयी...ऐसाभी कभी हो सकता है? माँ साथ न हो? घरमे रिकॉर्ड प्लेएर पे एक गीत हमेशा सुना करती थी मै...शमशाद बेगम का गाया हुआ...."छोड़ बाबुल का घर, मोहे पीके नगर, आज जाना पडा,आज जाना पडा, याद करके ये घर, रोयीं आँखें मगर ,मुस्कुराना पडा, आज जाना पडा.."
याद है,मैंने आपसे पूछा था," अम्मा ! 'बाबुल" का " घर क्या होता है?"
अम्मा: ""बाबुल"का घर मतलब अपनी माँ घर, अपने पिता का घर..."
मै:" और 'पीका' घर मतलब?"
अम्मा:" पीका" घर मतलब, जैसे,ये घर मेरे लिए है...ये घर मेरी माँ का घर नही..मै शादी करके,फिर यहाँ रहने आयी....ये मेरे 'पतीका" मतलब 'पीका" घर है....तेरे 'बाबा' मेरे 'पी' हैं..!"
मै:" क्यों? आपको अपना घर क्यों छोड़ना पडा? नानीअम्मा को बुरा नही लगा आपको यहाँ भेज देना? और वो गानेवाली को क्यों जाना पडा? उसके साथ किसीने ज़बरदस्ती की? उसको रोना भी आया फिरभी उसको क्यों जाना पडा?"
मुझे याद है, आप बोलीं थीं:"एक दिन तुझेभी जाना पडेगा..इसी तरह...और शायद तू खुशीसे जायेगी...हो सकता है, जाते समय रो दे......"
मैंने वो ख़याल अपने मनसे पूरी तरह झाड़ दिया...ऐसा होही नही सकता...मै अपनी माँ, दादा, दादी और इस घर को छोड़ के कहीँ भी नही जा सकती...बल्कि, नही ही जाऊँगी...!
लेकिन, चलीही गयी...हाँ, रोई तो बोहोत...घरको तो भूल पाना ....वो तो खैर , नामुमकिन है...!..उस घरमे कितनेही बदलाव हो गए, लेकिन मुझे, वो घर वैसाही दिखता है, अपने सपनों में, जैसा तब था..जब आपका और मेरा ये सम्भाषण हुआ था...
इतने बरसों बादभी,मुझे "अपने घरके" तौरपे वही घर दिखता है! मुझे अपने ससुराल वालेभी गर सपनेमे दिखते हैं, तो उसी घरमे....! मुझे आजतक कोई अन्य घर दिखाही नही!
और ये बात आपकी छोटी बेटीके साथभी होती है...इतनाही नही..हमें किहीम भी और वहाँ का समंदर भी ( मेरे परदादाका एक घर किहीम, इस गाँव के, समंदरके किनारे, था....मुम्बईके पास), अपने खेतको लगी ज़मीनपे दिखता है...और सिर्फ़ मुझे और कुन्नुको नहीँ...आपके बेटेको भी किहीम का समंदर वहीँ नज़र आता है,अपने सपनोंमे... !!!उसे अपना घर छोड़, अन्य घर जाना नही पडा, तो उसे बचपनका घर सपनेमे दिखना लाज़िम है..लेकिन हम दोनों लड़कियोंको???
पता है आपको अम्मा...जब दादा के गुज़र जानेके बाद, दादीअम्मा कुछ रोज़ मेरे पास आके रहीँ,तो हमारी ये सपनों में घर दिखने वाली बात निकली...हैरान रह वो बोलीं," मुझे मेरा मायका छोडे ७२ सालसे अधिक हो गए...लेकिन, सपनेमे मुझे वही खम्बात का घर दिखता है..!"
सोचो तो ज़रा...दादाके साथ उनकी ज़िंदगी कितनी खुश गँवार गुज़री...! जिस दिन दादा गुज़र गए, वो उन दोनोकी शादीकी ७२ वी सालगिरह थी...! जिस दिन साथ जुड़े , उसी दिन बिछडे...!
लड़कियाँ क्यों "पराया धन" कहलातीं हैं? उनकी जड़ें कितनी अधिक उस भूमी, उस घरसे जुडी होती हैं, जहाँ, उनका बचपन गुजरता है...जहाँ उन्हें अपने यौवन मे पनाह मिली होती है..!!!जहाँ उन्हें सुरक्षित महसूस कराया जाता है...या जाना चाहिए...
वो एक शाम मुझे आजतलक नहीँ भूली...मै अपने दादा-दादीके साथ खेतपे घूमने गयी थी...वहाँसे लौटी तो आप रसोईकी सीढीपे खड़ी मिली..मै आपके क़रीब गयी,तो आपने मेरा माथा चूमा....उस एक प्यारे चुम्बनने मुझे कितना सुरक्षित महसूस कराया...मै इतने बरसों बादभी नही भूली...!
और एक बात के लिए मै आपकी ताउम्र शुक्र गुज़ार रहूँगी....ना जाने उस वक़्त आप मुझसे वैसा नही करवाती ,तो, मै ज़िंदगीभर कितना अधिक पछताती...३ सालकी उम्र होगी मेरी...फिरभी वो वाक़या मेरे ज़हन मे अंकित होके रह गया...नाभी रेहता, गर उसके अगले दिन जो घटा ,वो, ना घटा होता...आजभी सिहर जाती हूँ..आजभी अपनी प्यारी माँ के आगे नतमस्तक हो जाती हूँ...
आपके सदाही रुण मे रहना चाहती हूँ...चाहूँगी..."
क्रमश:
Subscribe to:
Posts (Atom)
