Tuesday, January 12, 2010

माँ ! प्यारी माँ ! ६

"अम्मा ! आप कुछ देर बाहर गयीं हैं, तो मैंने आगे लिखने का मौक़ा हथिया लिया...! जानती हूँ, आपके घरमे रहते मै, नेट पे बैठ जाती हूँ, तो आपको बड़ा घुस्सा आता है...!

"कुछ रोज़ पूर्व, चंद अल्फाज़ लिखे थे....शायद हर बेटी को यही महसूस होता हो...या फिर जिन बेटियों को ये महसूस होता है, उनकी माँ उस क़ाबिल होती हो!

"मिलेगी कोई गोद यूँ,
जहाँ सर रख लूँ?
माँ! मै थक गयी हूँ!
कहाँ सर रख दूँ?

तीनो जहाँ ना चाहूँ..
रहूँ, तो रहूँ,
बन भिकारन रहूँ...
तेरीही गोद चाहूँ...

ना छुडाना हाथ यूँ,
तुझबिन क्या करुँ?
अभी एक क़दम भी
चल ना पायी हूँ !

दर बदर भटकी है तू,
मै खूब जानती हूँ,
तेरी भी खोयी राहेँ,
पर मेरी तो रहनुमा तू!

"अम्मा ! आपके इतिहास की पुनुराव्रुत्ती मेरे साथ हुई...हम दोनों ने जब कभी, किसी औरको सहारा देके उठाना चाहा, उसने हम ही को गिराया...वो उठा या नही, ये नही पता...लेकिन हम ज़रूर आहत हुए....बार, बार जीवन ने हमारे संग ये खेल खेला...आज तक नही समझ सकी, कि, दो समांतर रेषायों की भाँती हमारी ज़िंदगी कैसे चली??

"कैसे, कैसे दर्द समेटे हम दोनों चलते रहे...रहगुज़र करते रहे...?सिलसिला है,कि, थमता नही....दोनों के जीवन में बेशुमार ग़लत फेहमियाँ शामिल रहीं...एक से निपट लेते तो दूसरी हाज़िर...! ये कैसे इत्तेफ़ाक़ रहे?

"बोहोत कुछ लिखना चाह रही हूँ..लेकिन, सारी उम्र कम पड़ सकती है...और किस उम्र की बात करूँ?? आपकी अनगिनत यादें लिख चुकी हूँ...फिरभी लगता है, अभी तो कुछ नही कहा...! कुछ भी नही! ये समापन किश्त है, या और सफर बाक़ी है, मेरे लेखन का...आपके लिए...??गर होगा तो, उसे कुछ अन्य नाम दे दूँगी...शुक्र गुज़ार हूँ, अम्मा आपकी, के मुझे ऐसा अनुभव आपके रहते मिला...के ऐसी माँ मिली...आपसे होके जो राह गुज़री, उसमे शामिल हर ममता को नमन....हर ममता को सलाम !"

समाप्त ।

8 comments:

Bhagyashree said...

Beautiful!!

हृदय पुष्प said...

"मिलेगी कोई गोद यूँ,
जहाँ सर रख लूँ?
माँ! मै थक गयी हूँ!
कहाँ सर रख दूँ?
हर ममता को नमन....हर ममता को सलाम !"
आमीन.

दिगम्बर नासवा said...

ना छुडाना हाथ यूँ,
तुझबिन क्या करुँ?
अभी एक क़दम भी
चल ना पायी हूँ ...

आपने ठीक लिखा है ..... मां की छाया की बिना एक कदम चलना दूभर है ..........

सर्वत एम० said...

बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आना हो सका है. कोई बात नहीं थी लेकिन जाने क्यों इतनी लाजवाब सीरीज़ से खुद को महरूम रखा था. फ़िलहाल, आज सारी किस्तें पढ़ डालीं. पहले सोचा, अलग-अलग किस्तों पर कमेन्ट दूं मगर थोड़ा आलसी भी हूँ ना, इस लिए यही बेहतर समझ लिया की एक ही बार में काम तमाम कर दिया जाए.
आपके लेखन के बारे में कुछ कहना, अपनी ही बात को दुहराने जैसा है. आप हमेशा की तरह फिर मन को छू गईं.

Babli said...

बहुत सुन्दर और ममताभरी रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी ! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

kya kahun "maa" shabd ke hi saamne main nihshabd ho jata hun... maa dil ki aawaj dil se sun leti hai jise apne vatsalya, mamta aur pyaar se pura kar deti hai...

dimple said...

kyee baar apke blog dekhti thi par kuch naya nahi hota tha.aap ne fir se likhna shuru kar diya hai.achha lga.apki rachna hmesha ki tarah khoobsurat hai.

Richa P Madhwani said...

http://shayari10000.blogspot.com