Thursday, December 31, 2009

माँ, प्यारी माँ! ४

" अम्मा ! आज जो ख़बर दी आपने, दिल एकबार फिरसे धक्-सा रह गया है...अम्मा अभी तो आपसे कितना कुछ कहना है...लिखना शुरू किया तभी, ऊपरवालेसे दुआ की थी, कि, आप मेरा लिखा पढ़ सकें, इतनी मोहलत तो मिले मुझे...

"आपका एक ख़त अपने सामने लिए बैठी हूँ...एक माँ ने अपनी बेटी को दिया प्रशस्ती पत्रक....बोहोत,बोहोत पहले मेरी बेटी ने मुझे, बडेही भोले भावोंसे, कुछ लिखके पकडाया था....मेरे लिए वो नायब tribute था....मैंने उस छोटेसे निबंध को उसकी teacher के पास पढनेके ख़ातिर दिया और मुझे वापस नही मिला...अब मैंने आपके इस खतको laminate करके रखा है...पहले तो उसकी प्रतियाँ निकाल लीं....

" आप लिखती है,'उस रोज़, मै ऐसेही फुरसत से सोचते बैठी थी...बरामदा खामोश था....कई ख़याल दिलकी राहोँ से गुज़रते रहे.....और जाना कि, उनका रुख तुम्हारी ओर हुआ....मै अनायास तुम्हारी कई सारी बातें याद करती रही...

"याद आता रहा, कि, तुमने हम सभी के लिए कितना कुछ किया है...खुले,बड़े दिलसे, बदलेमे कोई अपेक्षा न रखते हुए.....खुशीसे ओतप्रोत होते हुए....एक सम्पूर्णता से बस निछावर ही निछावर करती गयीं....

"चाहे वो मेरी अनगिनत बीमारियाँ हो, तुम्हारी छोटी बेहेनका ब्याह हो या, छोटे भाई का ब्याह हो...दादी अम्माकी सर्जरीस हों....या और कुछ....जोभी हो... खुले दिल और हाथोंसे तुम सभी को देतीही देती गयीं....सिर्फ़ हमीं लोगों को नहीं...तुम्हारे संपर्क में आनेवाले हरेक को तुमने खुले दिलसे दिया ही दिया...अपना-पराया,ये भेद किए बिना...जिसने जब माँगा, और गर वो युम्हारे पास था, उसे मिलही जाता...इतनी निरपेक्ष?

"जब, फुरसत के लम्हात होते हैं, मै तुम्हारेही बारेमे सोचने लग जाती हूँ....तुम्हारे लिए दुआएँ करती रहती हूँ...ख़ास करके , सूनी-सी दोपहर में या रातको सोनेसे पूर्व...मनसे ढेरों दुआएँ निकलती हैं....

"तुम मेरी सबसे अधिक, ख़याल रखनेवाली, सबसे अधिक समझदार बेटी हो...सबसे अधिक ज़िम्मेदार......
ढेरों प्यार सहित
अम्मा' "

"अम्मा! और लिखना बाकी है...इत्तेफ़ाक़ देखिये! अभी, अभी, लिखते,लिखते,एक गीत लताके सुरों में सुन रही थी...मानो अपना कलेजा उँडेल दिया उसमे लाताजी ने........अल्फाज़ कुछ इस तरह के थे,'
वो जो औरों की ख़ातिर जिए मिटे,
सोचती हूँ, उन्हें क्या मिला? उन्हें क्या मिला?
जैसे बादल बरसता हुआ,
प्यास सबकी बुझाता हुआ,
जैसे चंदन सभीके लिए,
अपनी खुषबू लुटाता रहा...
वहीँ तुम, अपना जीवन लुटाती रहीं....

पर तुम्हें प्यार किसका मिला,
ख्वाब देखे हमारे लिए,
एक पलभी अगर सो गयीं,
तुम हो माँ सारे परिवार की,
सबकी फिकरों में तुम खो गयीं..

तुम ना ब्याही, ना मेहंदी रची,
और न माथेको टीका मिला '
वो जो औरोंके ख़ातिर जिए,मिटे,
सोचती हूँ, उन्हें क्या मिला, क्या sssss मिला sssss?

" अम्मा ये ख़त पढ़ ,मेरी आँखों में कई बार आसूँ छलके...कई बार इसे सीनेसे लगाया... पता नही ,और कितनी बार लगाए रखूँगी.......
"खैर! आप ब्याही तो गयीं...और इसीलिये तो मेरी, और मेरे भाई बेहेन की माँ बनी.....लेकिन इसके अलावा, हर वो क़ुरबानी दी, जो इस गीत से बयाँ होती है....और उससे भी अधिक...

अभी तो कितनी बातें करनी हैं...कईं बातों की माफ़ी भी माँग लेनी है...
क्रमश:

7 comments:

दिगम्बर नासवा said...

अनमोल मोती की तरह आपकी पोस्ट है ....... माँ के रिश्तों की गर्माहट को हूबहू महसूस कर रहा हूँ ........ बहुत लाजवाब .......

आपको और आपके पूरे परिवार को नये साल की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ........

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

psingh said...

इस सुन्दर रचना के लिए बहुत -बहुत आभार
नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं

SACCHAI said...

" alfaz kum pad rahe hai ki aapko mai kaise sukriya kahu ."

" MAA .....aur rishta ...anmol ....anmol post ..behtarin "

" MMAAFI CHAHTA HU KI MAI AAPKE BLOG PER KUCH KAAM KI VAJAH SE AA NAHI SAKTA THA ..DAR ASAL MAINE MERA BLOG BHI AAJ HI DEKHA HAI ."

------ eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

Bhagyashree said...

very beautifully written, each post in this series have brought tears to my eyes

ज्योति सिंह said...

पर तुम्हें प्यार किसका मिला,
ख्वाब देखे हमारे लिए,
एक पलभी अगर सो गयीं,
तुम हो माँ सारे परिवार की,
सबकी फिकरों में तुम खो गयीं..
itni khoobsurat rachna hai ki nishabd ho gayi main ,sirf mahsoos hi kar rahi hoon maa ki mamta aur tyaag ko

ज्योति सिंह said...

पर तुम्हें प्यार किसका मिला,
ख्वाब देखे हमारे लिए,
एक पलभी अगर सो गयीं,
तुम हो माँ सारे परिवार की,
सबकी फिकरों में तुम खो गयीं..
bahut hi marmik aur sach bhi